लेखक
मुहम्मद साजिद
भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में जहां एक ओर राजनीति और संघर्ष की गूंज थी, तो वहीं कुछ ऐसे नाम भी थे, जो नफरत की दीवारों के बीच संवाद और शिक्षा की नींव रख रहे थे। ऐसे ही एक नाम था डॉ.अब्दुल मजीद ख्वाजा का, आज ही के दिन यानी 03 अगस्त, 1885 को उनकी यौम- ए-पैदाइश (जन्म) हुआ था। यह एक ऐसा नाम है, जो एक अच्छे वकील, समाज सुधारक, शिक्षाविद और गांधीवादी थे। उनकी पहचान न केवल जामिया मिल्लिया इस्लामिया के संस्थापक के रूप में थी, बल्कि महात्मा गांधी के सबसे करीबी मुस्लिम साथियों में भी होती है।
अलीगढ़ से आज़ादी तक योगदान
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डॉ.अब्दुल मजीद ख्वाजा का जन्म 1885 में उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में हुआ। उसी शहर में जहां सर सैयद अहमद खान का अलीगढ़ आंदोलन पनप रहा था। ख्वाजा AMU के छात्र रहे, लेकिन उन्होंने सिर्फ़ शिक्षा नहीं पाई, बल्कि विचारों की मशाल भी उठाई। वो अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (AMU) की परंपरा से निकले पहले व्यक्तियों में से थे। जिन्होंने गांधीवादी विचारधारा को अपनाया। यह उस दौर की अभूतपूर्व बात थी, जब मुस्लिम समाज के एक बड़े वर्ग का झुकाव जिन्ना और मुस्लिम लीग की ओर बढ़ रहा था। मगर, ख्वाजा मुस्लिम लीग, और जिन्ना से उतने ही दूर थे।
सर्वधर्म सभा में ऐतिहासिक ऐतिहासिक
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जब भी अलीगढ़ आते, तो डॉ.अब्दुल मजीद ख्वाजा के घर ही ठहरते। इतना ही नहीं, गांधी जी ने ख्वाजा की पत्नी को उर्दू में कई निजी पत्र लिखे, जो आज भी मौलाना आज़ाद लाइब्रेरी में सुरक्षित हैं। यह उस गहरी मित्रता और वैचारिक साम्य का प्रमाण है जो दोनों में थी, जब गांधी जी की समाधि पर कुरान पाठ की आवश्यकता पड़ी, तब यही डॉ.अब्दुल मजीद ख्वाजा थे। जिन्होंने कुरान की आयतें पढ़ीं। सर्वधर्म सभा में उनका योगदान ऐतिहासिक था। एक गांधीवादी मुसलमान, जो भारत की साझी संस्कृति का जीवंत प्रतीक था।
जामिया की नींव रखने से लेकर कुलपति और, फिर कुलाधिपति का जिम्मा
1920 में जब गांधी जी ने असहयोग आंदोलन के तहत सरकारी शिक्षण संस्थानों से दूरी बनाने की अपील की, तब डॉ.अब्दुल मजीद ख्वाजा ने हकीम अजमल खां और डॉ. मुख़्तार अहमद अंसारी के साथ मिलकर दिल्ली में जामिया मिल्लिया इस्लामिया की स्थापना की। इसके बाद में वह इस संस्थान के कुलपति (Vice -Chancellor) और फिर कुलाधिपति (Chancellor) भी बने।यह संस्था आज भी ख्वाजा की सोच और सेकुलरिज्म की मिसाल के रूप में खड़ी है।
पहली फार्मा कंपनी सिपला की स्थापना
यहां यह बताना ज़रूरी है कि डॉ. ख्वाजा अब्दुल हमीद, जो भारत की पहली फार्मा कंपनी “सिपला” के संस्थापक थे। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में आर्थिक योगदान देकर यह सिद्ध किया कि मुल्क की सेवा केवल जेल जाकर नहीं, बल्कि संस्थाएं बनाकर भी की जा सकती है, जब दूसरे लोग “वीरता” के नाम पर अंग्रेज़ों से पेंशन ले रहे थे, तब डॉ.ख्वाजा अब्दुल हमीद अपनी पूंजी स्वराज की राह में लगा रहे थे। 2 दिसंबर 1962 को जब डॉ.अब्दुल मजीद ख्वाजा का निधन हुआ, तब भारत ने एक ऐसे शांतिप्रिय राष्ट्रनिर्माता को खो दिया, जो धर्म और राष्ट्रवाद के बीच एक सेतु था। उनकी स्मृति में अलीगढ़, दिल्ली और जामिया में आज भी विचारशील लोग उनकी शिक्षाएं और योगदान याद करते हैं। हालांकि, मुख्यधारा की राजनीति और मीडिया उन्हें लगभग भुला चुकी है।
