निधि पाठक
आज का युद्ध इतिहास की किताबों का अध्याय नहीं, बल्कि हमारे समय की कड़वी सच्चाई है। सूडान, गाज़ा और यूक्रेन जैसे संघर्ष क्षेत्रों में हर दिन मानवता की परीक्षा हो रही है। इस परीक्षा में एक सच्चाई बेहद स्पष्ट होकर सामने आती है।महिलाएं युद्ध में सबसे ज्यादा पीड़ित होती हैं, लेकिन वही सबसे मजबूत होकर उभरती भी हैं। बल्कि उसे स्थायी और मानवीय बनाया जाए, और यह तभी संभव है जब, महिलाएं शांति प्रक्रिया की भागीदार नहीं, बल्कि नेतृत्वकर्ता बनें।क्योंकि, जब युद्ध के समय महिलाएं नेतृत्व करती हैं, तो शांति केवल अस्थायी नहीं रहती, बल्कि स्थायी, संवेदनशील और मानवीय बन जाती है।
संकट की सबसे बड़ी मार, फिर भी सबसे बड़ी जिम्मेदारी
युद्ध केवल गोलियों और बमों तक सीमित नहीं होता। यह तोड़ता है। परिवार सामाजिक मूल्य और इंसानी रिश्तों का ताना-बाना सूडान में महिलाएं हिंसा और विस्थापन का सामना कर रही हैं, फिर भी अपने परिवार की जिम्मेदारी संभाल रही हैं। गाज़ा में वे मलबे के बीच जीवन को थामे हुए हैं। यूक्रेन में महिलाएं राहत कार्यों का नेतृत्व कर रही हैं और समाज को फिर से खड़ा करने में जुटी हैं। यानी, जहां एक ओर वे पीड़िता हैं, वहीं दूसरी ओर वे समाज की रीढ़ भी हैं।
शास्त्रों की चेतावनी और आज का विरोधाभास
भारतीय परंपरा सदियों से कहती आई है, “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः”जहां नारी का सम्मान होता है, वहीं देवता निवास करते हैं लेकिन आज का प्रश्न यह है, अगर महिलाएं समाज की आधारशिला हैं, तो वे शांति वार्ता और नीति -निर्माण के सर्वोच्च मंचों से अभी भी दूर क्यों हैं?
युद्ध का नया चेहरा-बंदूक से आगे की लड़ाई
आज के युद्ध सिर्फ हथियारों से नहीं लड़े जा रहे, बल्कि, भूख, विस्थापन, मानसिक आघात जैसे संकटों के जरिए समाज को तोड़ा जा रहा है। ऐसे में केवल रणनीति और ताकत से शांति संभव नहीं।इसके लिए संवेदनशीलता, धैर्य और समावेशिता की जरूरत है,और यही गुण महिलाएं स्वाभाविक रूप से लेकर आती हैं। शांति की असली निर्माता -महिलाएं हैं। स्थानीय स्तर पर शांति वार्ता कर रही हैं। समुदायों के बीच भरोसा बहाल कर रही हैं, और बच्चों की शिक्षा जारी रख रही हैं, और टूटे समाज में गरिमा लौटा रही हैं। वे शांति का इंतजार नहीं कर रहीं, बल्कि, वे शांति बना रही हैं। “वसुधैव कुटुम्बकम्” और महिला नेतृत्व की अनिवार्यता हमारी संस्कृति कहती है,“वसुधैव कुटुम्बकम्”, पूरी दुनिया एक परिवार है।
क्या दुनिया सच में एक परिवार?
अगर दुनिया सच में एक परिवार है, तो यह सवाल और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। क्या, बिना महिलाओं की भागीदारी के कोई परिवार चल सकता है? तो फिर शांति निर्माण में महिलाओं की भागीदारी क्यों सीमित है?। नीतियों में बदलाव का समय प्रतीक नहीं, नेतृत्व चाहिए अब समय आ गया है कि हम केवल महिलाओं की पीड़ा को स्वीकार न करें, बल्कि उनके नेतृत्व को भी मान्यता दें। हमें बदलाव लाना होगा। पीड़िता से शक्ति तक चुप्पी से नेतृत्व तक बहिष्कार से सहभागिता तक है। शांति की नई परिभाषा शांति केवल युद्ध का अंत नहीं है। शांति है, गरिमा, संतुलन और सामंजस्य है। यही भाव हमारे शास्त्रों में झलकता है,“सर्वे भवन्तु सुखिनः…”
