नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ी सुनवाई में कानून के छात्र मोहम्मद फैयाज मंसूरी को राहत देने से इनकार कर दिया. मंसूरी ने अपने खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले को रद्द करने की मांग की थी, जो सोशल मीडिया पर बाबरी मस्जिद को लेकर किए गए एक पोस्ट के बाद दर्ज हुआ था. हालांकि सर्वोच्च न्यायालय ने साफ कर दिया कि वह इस मामले में दखल नहीं देगा और ट्रायल कोर्ट को ही सभी पहलुओं पर फैसला लेने दिया जाए.
सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमल्य बागची की पीठ ने कहा कि उन्होंने संबंधित पोस्ट देखी है और उन्हें इसमें हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं दिखा. अदालत के रुख को भांपते हुए याचिकाकर्ता के वकील तल्हा अब्दुल रहमान ने याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी, जिसे कोर्ट ने मंजूर कर लिया.
वकील की ओर से कोर्ट में यह कहा गया कि सोशल मीडिया पोस्ट में न तो कोई भड़काऊ शब्द थे और न ही कोई अश्लील टिप्पणी. मंसूरी ने केवल बाबरी मस्जिद को दोबारा बनाए जाने की बात कही थी और तर्क दिया कि तुर्की में भी एक मस्जिद को फिर से बनाया गया है. साथ ही यह भी दलील दी गई कि असल में हिंदू देवी-देवताओं पर आपत्तिजनक टिप्पणी किसी और शख्स ने की थी, लेकिन जांच सिर्फ मंसूरी के खिलाफ की गई.
इस पर कोर्ट ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनसे कोई कठोर टिप्पणी न कराई जाए. पीठ ने आदेश में स्पष्ट किया कि याचिका वापस लेने की अनुमति दी जाती है. साथ ही यह भी कहा कि याचिकाकर्ता द्वारा दिए गए सभी बचाव संबंधी तर्क ट्रायल कोर्ट में उनके गुण-दोष के आधार पर सुने और तय किए जाएंगे.
गौरतलब है कि अगस्त 2020 में लखीमपुर खीरी में मंसूरी के खिलाफ यह मामला दर्ज हुआ था. उन पर आरोप है कि उनके सोशल मीडिया पोस्ट के बाद एक अन्य व्यक्ति ने हिंदू धर्म के देवताओं के खिलाफ आपत्तिजनक बातें लिखीं, जिसके बाद जिला प्रशासन ने मंसूरी की गिरफ्तारी का आदेश दिया. हालांकि बाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गिरफ्तारी आदेश को रद्द कर दिया था.
इसके बाद भी मामला चलता रहा और इस साल की शुरुआत में ट्रायल कोर्ट ने पुलिस की चार्जशीट पर संज्ञान लिया. इस फैसले को चुनौती देते हुए मंसूरी ने फिर से हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया, लेकिन वहां भी उन्हें राहत नहीं मिली. अंततः वे सुप्रीम कोर्ट पहुंचे, जहां अब उन्हें ट्रायल का सामना करने के लिए वापस भेज दिया गया है.
