हैदराबाद का असली वीर, जिसने काला पानी की जेल से भी भागकर आज़ादी की मशाल जलाई
लेखक
मुहम्मद साजिद
भारत की आज़ादी की कहानी में कई ऐसे नाम हैं, जिन्हें मुख्यधारा के इतिहास ने भुला दिया, लेकिन आम लोगों की ज़ुबान पर ये नायक आज भी ज़िंदा हैं। इन्हीं में से एक नाम है तुर्रेबाज़ खान ‘तुर्रम खान’, जिन्हें लोग प्यार से शेर-ए-हिन्द भी कहते हैं। हैदराबाद के बेगम बाजार में जन्मे इस क्रांतिकारी ने अंग्रेजों के खिलाफ जंग लड़ी और अपनी जान की परवाह किए बिना आज़ादी की मशाल जलाए रखी। उनकी बहादुरी ने अंग्रेजी सरकार को परेशान कर दिया, और उन्हें पकड़वाने पर इनाम तक घोषित करना पड़ा।
ब्रिटिश समर्थक निज़ाम के खिलाफ उठाई आवाज़
1857 में जब उत्तर भारत में विद्रोह की खबर पहुँची, तो हैदराबाद के आम लोग भी भड़क उठे। लेकिन निज़ाम का दरबार अंग्रेजों का साथ दे रहा था। ऐसे समय में तुर्रेबाज़ खान ने निर्भीक होकर ब्रिटिश सरकार के खिलाफ अभियान चलाया। वे न सिर्फ निज़ाम के विरोधी थे, बल्कि उन्होंने अंग्रेजों द्वारा बंद किए गए क्रांतिकारियों को छुड़ाने के लिए रेजीडेंसी पर हमला करने की योजना बनाई। यह हमला केवल विद्रोह नहीं था, बल्कि आज़ादी के लिए दिलेराना कदम था।
रेजीडेंसी पर हमला और क्रांति की आग
17 जुलाई 1857 को जुमे की नमाज़ के बाद तुर्रेबाज़ खान ने लोगों को संबोधित कर विद्रोह का आह्वान किया। उनके नेतृत्व में 500 से अधिक लोग ब्रिटिश रेजीडेंसी पर धावा बोलने पहुँचे। दीवारें गिराई गईं, हाथापाई हुई और कई वीर शहीद हुए। ब्रिटिश प्रशासन दहशत में आ गया, लेकिन तुर्रेबाज़ खान घायल अवस्था में भागने में सफल रहे। ‘The Hyderabad Residency Reports (1857–1859)’ में इस घटना का उल्लेख मिलता है।
काला पानी की सजा और वीरता की मिसाल
बाद में अंग्रेजों ने उन्हें पकड़ लिया। उन्हें अंडमान की सेलुलर जेल भेजा गया, एक ऐसी जेल जहाँ से भागना असंभव समझा जाता था। लेकिन उनकी जिजीविषा और साहस ने अंग्रेजों की नींद उड़ा दी। 18 जनवरी 1859 को वह जेल से फरार हो गए। उनके सिर पर 5,000 रुपये का इनाम रखा गया, जो उस दौर में एक बड़ी राशि थी। अंततः धोखे से उन्हें पकड़ लिया गया और शहर के बीचोंबीच गोली मारकर लटका दिया गया, ताकि अन्य क्रांतिकारियों में खौफ फैल सके। फिर भी उनकी वीरता की मिसाल आम लोगों में जीवित रही।
लोककथाओं में नाम अमर
हैदराबाद की बोली में ‘तुर्रम खान’ शब्द आज भी किसी बहादुर और अड़ियल इंसान के लिए प्रयोग होता है। यह शब्द उसी वीर क्रांतिकारी से प्रेरित है। उनके नाम पर सड़क और स्मारक बनाए गए हैं, लेकिन अफ़सोस कि पाठ्यपुस्तकों में उनका नाम कहीं खो गया। ‘Political Movements in Deccan, 19th Century’ जैसी किताबों में उनके योगदान का उल्लेख है, लेकिन आम लोगों तक उनकी वीरता की कहानी पहुँची नहीं।
इतिहास का अधूरा सच
Times of India की रिपोर्ट में पत्रकार पापरी पॉल ने लिखा है,
“इस क्रांतिकारी कृत्य ने 1857 के विद्रोह में हैदराबाद को इतिहास के नक्शे पर ला खड़ा किया।”आज भी जब कोई व्यक्ति बहादुरी दिखाता है तो उसे कहा जाता है, “बहुत तुर्रम खां बनते हो!”। यह कहावत दरअसल उसी क्रांतिकारी का सम्मान है जिसने अंग्रेजों को चुनौती दी, जेल से भागा और आख़िर तक लड़ता रहा।
