बरेली की हवाओं में अब भी तैरती हैं वो सदाएं… जहां कभी अदालतें लगती थीं, अब बस यादें बाकी हैं।”पुराना शहर के रोहिली टोला से कोट की गलियों में क़दम रखो, तो लगता है वक़्त ठहर सा गया है। यहां कभी हुकूमत चलती थी।” लेखक अब्दुल अज़ीज़ ख़ां आसी की किताब ‘तारीख़-ए-रुहेलखंड’, ‘रुहेलखंड 1857’ (रज़ा लाइब्रेरी, रामपुर), और सरकारी दस्तावेज़ “विक्टोरिया मेमोरियल, कोलकाता में काजी परिवार के खिताब का रेकॉर्ड आज भी मौजूद है। यहां रोहली टोला, और जगतपुर में अदालत लगती थी। मगर, अब मकान बन चुके हैं। हालांकि, प्रो. गिरिराज नंदन की किताब ‘बरेली’ में पुराना शहर के कोट मोहल्ले में अदालत लगने की बात कही गई है। मगर, रोहली टोला निवासी हामिद रजा खां बताते हैं हमने भी अदालत का खंडहरनुमा भवन देखा है। यह इलाका आज भी लड्डन खां के फाटक से मशहूर है। यहां अंग्रेजों की अदालत लगती थी। प्रो. गिरिराज नंदन की किताब में सन् 1500 ई. में राजा जगत सिंह कठेरिया के बरेली की नींव रखने की बात कही गई है। उनके बेटे बरल देव के नाम पर ही शहर का नाम “बरेली” पड़ा था। इतिहासकार अब्दुल अज़ीज़ ख़ां आसी किताब में भी इस स्थापना का उल्लेख मिलता है।
राजा की अदालत में बने रिहायशी मकान
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प्रो.गिरिराज नंदन की किताब में कोट मुहल्ले में जिस जगह अदालत लगती थी। वहां अब रिहायशी मकान हैं। लड्डन साहब का फाटक जहां अंग्रेजों के ज़माने की अदालत लगती थी। वह भी अब जर्जर है। मिर्ज़ाई मस्जिद, चिराग अली शाह मस्जिद जैसी मुगलकालीन इमारतें आज भी इतिहास का गवाह बनी हुई हैं।
