संविधान के सिपाही मौलाना श्योरहवी ने मज़हब को नफ़रत नहीं, इंसाफ़ से जोड़ा
जब इतिहास स्वतंत्र भारत के निर्माण की कहानी कहता है, तो कुछ नाम गूंजते नहीं, बल्कि मन में उतरते हैं। मौलाना हिफजुर्रहमान श्योरहवी ऐसा ही एक नाम हैं, जो धर्म, राजनीति और राष्ट्रवाद के संगम पर खड़े होकर भारत की आत्मा को दिशा देते रहे। वे न केवल एक मज़बूत मुस्लिम नेता थे, बल्कि एक ऐसे राष्ट्रभक्त भी, जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भागीदारी निभाई, और बाद में भारतीय संविधान के निर्माण में उल्लेखनीय भूमिका अदा की। आज यानी दो अगस्त को मौलाना श्योरहवी की वरसी (पुण्यतिथि) है। उनकी पैदाइश (जन्म) यूपी के बिजनौर जिले के स्योहारा में 10 जनवरी, 1901 को हुआ था। मौलाना हिफजुर्रहमान श्योरहवी का पालन-पोषण एक ऐसे धार्मिक परिवेश में हुआ, जहां इस्लामी शिक्षा, राष्ट्रप्रेम और सेवा के मूल्य घुल-मिल चुके थे। उनके पिता मौलाना शमसुद्दीन सिद्दीकी एक ज्ञानी शिक्षक थे। जिन्होंने अपने चारों बेटों को अलग-अलग क्षेत्रों में आगे बढ़ाया। इसमें वकील, कलेक्टर, हकीम और एक क्रांतिकारी।
धर्म और राष्ट्र के बीच सेतु बने मौलाना
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मौलाना हिफजुर्रहमान ने दारुल उलूम देवबंद, मदरसा फैज़ियान स्योहारा, और जामिया इस्लामिया गुजरात जैसे संस्थानों में पढ़ाई की। उनके भीतर इस्लाम की शिक्षा और स्वतंत्रता संग्राम की चेतना एक साथ पनपी।मौलाना हिफजुर्रहमान ने इस ज्ञान को संकीर्णता में नहीं, बल्कि जनसेवा और राष्ट्र सेवा में रूपांतरित किया। वे उस परंपरा से आए थे, जहां धर्म केवल व्यक्तिगत आस्था नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, समानता और मानवता का माध्यम था। उन्होंने अपने विचारों और कर्मों से यह साबित किया कि इस्लाम भारतीयता के खिलाफ नहीं, बल्कि उसकी साझी विरासत का हिस्सा है। वे पाकिस्तान की मांग के मुखर विरोधी थे, और भारत में मुसलमानों को लोकतंत्र और संविधान से जोड़ने की मुहिम के अगुआ बने।
स्वतंत्रता संग्राम से संसद तक
1930 के नमक सत्याग्रह में जेल गए मौलाना, न केवल अंग्रेजों के खिलाफ, बल्कि हर प्रकार की गुलामी के खिलाफ खड़े रहे। असहयोग आंदोलन, भारत छोड़ो आंदोलन समेत हर कदम पर मौलाना की हिस्सेदारी रही। स्वतंत्रता के बाद वे संविधान सभा के सदस्य बने, और तीन बार लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए। यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि जब भारत धर्म के नाम पर बंट रहा था, तब मौलाना हिफजुर्रहमान जैसे नेता संविधान को धर्मनिरपेक्षता और न्याय के मूल्यों से भरने में लगे थे।
सांप्रदायिक सौहार्द और शिक्षा के सच्चे प्रवक्ता
मौलाना का मानना था कि भारत के मुसलमानों को केवल धार्मिक नेतृत्व नहीं, सामाजिक और शैक्षणिक पुनर्जागरण की ज़रूरत है। वे शिक्षा में आधुनिक विषयों को शामिल करने के पक्षधर थे। वे चाहते थे कि मदरसे केवल धर्म पढ़ाने तक सीमित न रहें, बल्कि वहाँ से डॉक्टर, वकील, वैज्ञानिक और प्रशासक भी निकलें। उनके जीवन का मूलमंत्र था, धर्म की जड़ों को थामे रहो, लेकिन दुनिया को बदलने के लिए ज्ञान और विवेक से काम लो।
धर्मनिरपेक्षता की ज़िंदा मिसाल
जब आज की राजनीति में धर्म को नफरत फैलाने के औज़ार के रूप में इस्तेमाल किया जाता है, तब मौलाना हिफजुर्रहमान की छवि एक आईने की तरह सामने आती है। उन्होंने संसद के भीतर और बाहर हिंदू -मुस्लिम एकता का जो संदेश दिया, वह आज पहले से अधिक प्रासंगिक है। वे कहते थे।“मज़हब का सच्चा अर्थ है इंसाफ़, और इंसाफ़ ही संविधान की आत्मा है।”उनकी इस सोच ने उन्हें महज़ एक धार्मिक नेता नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र का विवेकशील संरक्षक बना दिया।
संविधान सभा के सदस्य, और तीन बार सांसद
उनकी स्वतंत्र भारत में लोकतांत्रिक भूमिका रही। वह 1949 में उत्तर प्रदेश विधानसभा के सदस्य बने। 1952, 1957, और 1962 यानी तीन बार अमरोहा से लोकसभा सांसद चुने गए थे। संविधान सभा सदस्य भी रहे। शिक्षा, अल्पसंख्यक अधिकार, धर्मनिरपेक्षता और सांप्रदायिक सौहार्द पर प्रखरता से बोलते थे। उनका कहना था कि “इस्लाम मुझे अन्याय के खिलाफ खड़ा होना सिखाता है, संविधान मुझे वह हक़ देता है।”मौलाना ने मदरसों में विज्ञान, राजनीति, इतिहास जैसे विषयों को शामिल करने की वकालत की। वे चाहते थे कि मुस्लिम युवा केवल धर्मगुरु नहीं, बल्कि वैज्ञानिक, डॉक्टर, प्रशासक और नेता बनें। उनके अनुसार धर्म केवल इबादत नहीं, सामाजिक ज़िम्मेदारी है।
बलाउल मोबिन’,पैग़म्बर इस्लाम के ऐतिहासिक खत
उनकी किताब “बलाउल मोबिन” में पैग़म्बर-ए-इस्लाम द्वारा लिखे गए सभी ऐतिहासिक पत्र संकलित हैं। ये दस्तावेज़ केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि ऐतिहासिक और कूटनीतिक मूल्य भी रखते हैं। 1961 में कैंसर हुआ। मुंबई के टाटा अस्पताल, और फिर अमेरिका में इलाज कराया।।मगर, 2 अगस्त 1962 को सुबह 3:30 बजे इंतकाल (मृत्यु) हो गई। उनकी दिल्ली गेट पर नमाज -ए-जनाज़ा हुई। इसमें लगभग 2 लाख लोग शामिल हुए। उनको दिल्ली के मेहदियान कब्रिस्तान में दफनाया गया।
