लेखक
मुहम्मद साजिद
31 अक्टूबर, 1875 यानी आज ही के दिन सरदार बल्लभ भाई पटेल का जन्म नाडियाड शहर (वर्तमान खेड़ा ज़िला, गुजरात) में हुआ था, और उनका पालन-पोषण गुजरात राज्य के ग्रामीण इलाकों में हुआ। वे एक सफल वकील थे। स्वतंत्रता के बाद 562 रियासतों को एक सूत्र में पिरोकर भारत की भौगोलिक और राजनीतिक एकता की नींव रखी। पिता झवेरभाई किसान और माता लाडबाई धर्मपरायण महिला थीं। बचपन से ही उनमें दृढ़ इच्छाशक्ति और नेतृत्व का गुण था। राजमोहन गांधी की पुस्तक The Good Boatman के अनुसार, सरदार पटेल वकालत की पढ़ाई के लिए इंग्लैंड जाने वाले थे, टिकट “वी.जे. पटेल” के नाम से थी। लेकिन जब उन्हें पता चला कि उनके बड़े भाई भी वही सपना देखते हैं, तो उन्होंने टिकट उन्हें दे दी। यही त्यागभाव उनके जीवन का आधार बना।वकालत के शुरुआती दिनों में एक बार कोर्ट में केस लड़ते हुए उन्हें पत्नी के निधन की सूचना मिली। उन्होंने पत्र पढ़ा, शांतिपूर्वक जेब में रखा और मुकदमे की बहस पूरी की। जब जज ने कारण पूछा तो बोले- “कर्तव्य पहले, शोक बाद में।”यह वाक्य उनकी आत्मसंयम और देश के प्रति समर्पण का प्रतीक बन गया।
बारदोली सत्याग्रह: जहाँ “वल्लभभाई” बने “सरदार”
1928 में बारदोली के किसानों पर ब्रिटिश सरकार ने अन्यायपूर्ण कर थोपे। पटेल ने किसानों का नेतृत्व किया और शांतिपूर्ण आंदोलन से ब्रिटिश शासन को झुकने पर मजबूर कर दिया। गांधीजी ने तब उन्हें “सरदार” की उपाधि दी। यह आंदोलन न सिर्फ़ आर्थिक आज़ादी का प्रतीक बना, बल्कि नेतृत्व में अनुशासन और संगठन की मिसाल भी।
भारत का एकीकरण: जहाँ राजनीति नहीं, राष्ट्र सर्वोपरि
स्वतंत्रता के बाद भारत 562 रियासतों में बँटा हुआ था, हर राजा अपनी सत्ता बचाना चाहता था।
लेखक पी.एन. चोपड़ा के अनुसार, यदि सरदार पटेल की दृढ़ता और कूटनीति न होती, तो आज भारत 10–12 देशों में बँटा होता। उन्होंने जूनागढ़, हैदराबाद और कश्मीर जैसे जटिल मामलों को राजनीतिक चतुराई से सुलझाया। “राजनीति के लौह शिल्पी” ने बिना गोली चलाए भारत को एक मानचित्र पर जोड़ दिया।
लौह पुरुष की कार्यशैली
पटेल कहते थे “कानून और व्यवस्था देश की रीढ़ है; जो इसे ढीला करता है, वह राष्ट्र को खोखला करता है।”उन्होंने पुलिस, प्रशासन और सिविल सेवाओं को सुदृढ़ बनाया। भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) और भारतीय पुलिस सेवा (IPS) की स्थापना उनके प्रयासों का परिणाम थी। Freedom at Midnight में लेखक लिखते हैं- “कांग्रेस के अधिकतर सदस्य पटेल को प्रधानमंत्री बनाना चाहते थे, लेकिन गांधीजी की इच्छा नेहरू के पक्ष में थी। हालांकि, तमाम लेखकों की किताबों में इस बात का खंडन भी किया गया है।
“लौह पुरुष” क्यों कहे गए
सरदार पटेल की दृढ़ता, अनुशासन और राष्ट्रहित में अडिग संकल्प के कारण उन्हें “Iron Man of India” कहा गया। उन्होंने कहा था “हमारी आज़ादी केवल तब टिकेगी जब हम एक रहेंगे, जाति, धर्म, भाषा से परे।”
राष्ट्रीय एकता के प्रतीक: स्टैच्यू ऑफ यूनिटी
गुजरात के केवड़िया में 182 मीटर ऊँची स्टैच्यू ऑफ यूनिटी आज सरदार पटेल के अदम्य साहस और एकता के प्रतीक के रूप में खड़ी है। यह विश्व की सबसे ऊँची प्रतिमा है — जो हमें याद दिलाती है कि “भारत सिर्फ़ भूमि का टुकड़ा नहीं, एक विचार है। सरदार पटेल ने कहा था कि “हमारे राष्ट्र की शक्ति हमारी विविधता में है, और उसकी रक्षा हमारे अनुशासन में।”15 दिसंबर 1950, मुंबई में भारत ने अपना “लौह पुरुष” खो दिया था। सरदार वल्लभभाई पटेल। स्वतंत्रता के बाद जिस व्यक्ति ने 562 रियासतों को एक सूत्र में पिरोकर भारत की भौगोलिक और राजनीतिक एकता की नींव रखी, उनका जाना सिर्फ एक नेता का नहीं, बल्कि एक युग का अंत था।
