लेखक मुहम्मद साजिद
जलियांवाला बाग में जब जनरल डायर ने निहत्थे लोगों पर गोलियां बरसाईं, तब सैकड़ों लोग जान गंवा बैठे। इन्हीं लाशों के ढेर में 19 वर्षीय उधम सिंह भी पड़े थे, लेकिन घायल, और जिंदा। लेकिन उस दिन से उन्होंने जीना नहीं, बल्कि बदला लेना शुरू किया। उधम सिंह को पता था कि असली जिम्मेदार जनरल डायर नहीं, बल्कि पंजाब का लेफ्टिनेंट गवर्नर माइकल ओ’ड्वायर था। क्योंकि, उसी की इजाजत से यह नरसंहार हुआ था। बस, वही उनकी जिंदगी का एकमात्र मकसद बन गया।
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21 साल की तैयारी… और एक दिन, जिसने ब्रिटिश संसद को झकझोर दिया
13 मार्च 1940, लंदन के Caxton Hall में ‘ईस्ट इंडिया एसोसिएशन’ की मीटिंग चल रही थी। ब्रिटिश अधिकारी, राजनेता और साम्राज्यवादी वहां मौजूद थे। तभी सभा के बीच में उधम सिंह ने माइकल ओ’ड्वायर को गोली मार दी। गोली की आवाज सिर्फ हॉल तक सीमित नहीं रही, पूरे ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी तक गूंज गई। वह किताब में गन छिपाकर ले गए थे।
गिरफ्तारी, सुनवाई और ब्रिटिश अदालत के सामने सिंह दहाड़
उधम सिंह ने भागने की कोशिश नहीं की, उन्होंने गिरफ्तारी दी। नाम पूछा गया तो कहा,”मेरा नाम है मुहम्मद सिंह आज़ाद!”4 जून से 5 जून तक चली अदालती सुनवाई सिर्फ एक दिखावा थी। जब उनसे पूछा गया कि तुम्हें मौत क्यों न दी जाए, तो उनका जवाब इतिहास में दर्ज हो गया “मैं चाहता हूं कि ब्रिटिश साम्राज्यवाद का अंत हो। मैं अपने देश की आज़ादी के लिए जान दे रहा हूं।”जब जज ने उन्हें चुप कराना चाहा, तो उन्होंने ललकारा-“इंग्लैंड मुर्दाबाद, साम्राज्यवाद मुर्दाबाद!”
एकतरफा फैसला, लेकिन अमर हो गई आवाज
ब्रिटिश कोर्ट ने फांसी की सजा सुना दी। 31 जुलाई 1940 को लंदन की पेंटनविले जेल में उन्हें फांसी दे दी गई, लेकिन उधम सिंह की शहादत ने साबित कर दिया कि भारत का बेटा चाहे दुनिया के किसी भी कोने में हो, वो अन्याय का बदला लेना नहीं भूलेगा। जलियांवाला बाग हत्याकांड (13 अप्रैल 1919) पर हंटर कमीशन की जांच रिपोर्ट (1919) में उधम सिंह का जिक्र है, तो वहीं उधम सिंह की सुनवाई पर “The Daily Mirror” ने 2 अप्रैल 1940 को रिपोर्ट प्रकाशित की थी। इसमें उधम सिंह की शहादत को बताया गया है। हालांकि, नवतेज सिंह की “Shaheed Udham Singh: A Biography” में उधम सिंह की क्रांति की आग से ब्रिटिश हुकूमत के खात्मे की बात कही गई है।
बचपन में मां- बाप, और भाई खोए
26 दिसंबर, 1899 को पंजाब के संगरूर जिले के सुनाम गांव में जन्म लेने वाले उधम सिंह की उम्र सिर्फ तीन साल की थी। उसी वक्त मां को खो दिया। कुछ साल बाद पिता की भी मौत हो गई। उनके बड़े भाई मुक्ता सिंह को अनाथालय में शरण लेनी पड़ी। मगर, उनकी भी मौत हो गई। इसके बाद उन्हें अकेले ही जिंदगी काटनी पड़ी।
