क्रांति दिवस पर 1857 के अमर बलिदानियों को नमन, जिनके संघर्ष ने जगाई स्वतंत्रता की अलख
संजीव मेहरोत्रा
महामंत्री
बरेली ट्रेड यूनियन फेडरेशन
10 मई 1857 भारतीय इतिहास की वह तारीख है। जिसने गुलामी की जंजीरों में जकड़े देश में आज़ादी की पहली प्रचंड हुंकार भर दी थी। यह सिर्फ एक विद्रोह नहीं था, बल्कि भारत की अस्मिता, स्वाभिमान और स्वतंत्रता का पहला व्यापक जनआंदोलन था। मेरठ छावनी से उठी यह चिंगारी देखते ही देखते पूरे देश में ज्वालामुखी बनकर फूट पड़ी और अंग्रेजी हुकूमत की नींव हिल गई। हालांकि, इस क्रांति की शुरुआत का बीज 29 मार्च, 1857 को बैरकपुर छावनी में बोया जा चुका था, जब वीर सिपाही मंगल पांडे ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूंका। मंगल पांडेय का बलिदान भारतीय स्वाधीनता संग्राम की अमर गाथा का पहला अध्याय बन गया। इसके बाद 10 मई को मेरठ में सैनिक विद्रोह ने पूरे देश में स्वतंत्रता की चेतना को जगा दिया।इतिहासकारों का मानना है कि यह क्रांति अचानक नहीं हुई थी। इसके पीछे वर्षों की पीड़ा, आर्थिक शोषण, धार्मिक हस्तक्षेप और भारतीयों के अपमान की आग धधक रही थी। अंग्रेज शासकों की नीतियों ने किसानों, सैनिकों, व्यापारियों और आम जनता के भीतर गुस्सा भर दिया था। लॉर्ड बेकन ने भी स्वीकार किया था कि धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप, कानूनों में मनमाने बदलाव, बढ़ती महंगाई और भारतीयों के अपमान ने इस क्रांति को जन्म दिया।
नाना साहेब से लेकर बेगम हजरत महल तक, हर योद्धा बना आज़ादी का प्रतीक
1857 की क्रांति का इतिहास उन महान सेनानियों के बिना अधूरा है, जिन्होंने अपने प्राणों की आहुति देकर भारत की आज़ादी की नींव रखी। नाना साहिब, बहादुर शाह जफर, रानी लक्ष्मीबाई, कुंवर सिंह, तात्या टोपे, बेगम हजरत महल और मौलवी अजीमुल्ला जैसे योद्धाओं ने अंग्रेजी सत्ता को खुली चुनौती दी। झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का पराक्रम आज भी देशवासियों की रगों में जोश भर देता है। अंग्रेज सेनापति जनरल ह्यूरोज तक ने स्वीकार किया था कि “लक्ष्मीबाई विद्रोहियों में सबसे वीर और सर्वश्रेष्ठ सेनानी थीं।” कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान की पंक्तियां “खूब लड़ी मर्दानी, वह तो झांसी वाली रानी थी” आज भी हर भारतीय के दिल में राष्ट्रभक्ति की लौ जला देती हैं।
वीर कुंवर सिंह और तात्या टोपे का अद्भुत शौर्य
80 वर्ष की उम्र में भी कुंवर सिंह ने अंग्रेजों के खिलाफ ऐसा युद्ध लड़ा कि ब्रिटिश सेना कांप उठी। युद्ध के दौरान गोली लगने पर अपनी घायल भुजा स्वयं काटकर गंगा को समर्पित कर देना उनके अदम्य साहस का प्रतीक बन गया। वहीं तात्या टोपे ने लगातार अलग-अलग मोर्चों पर अंग्रेजों से संघर्ष किया। अंग्रेज लेखकों तक ने माना कि यदि तात्या टोपे जैसे कुछ और योद्धा होते, तो 1857 का इतिहास अलग होता।
सिर्फ विद्रोह नहीं, राष्ट्रीय चेतना का महायज्ञ था 1857
1857 की क्रांति को केवल सैनिक विद्रोह कहना इतिहास के साथ अन्याय होगा। यह राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक असंतोष का संगठित विस्फोट था। इस क्रांति ने अंग्रेजों को पहली बार एहसास कराया कि भारत अब हमेशा गुलाम नहीं रह सकता। यह वही क्रांति थी, जिसने आगे चलकर स्वतंत्रता आंदोलन की मजबूत नींव रखी। वीर सावरकर ने इसे “भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम” कहा था। इस क्रांति ने न सिर्फ भारत, बल्कि पूरी दुनिया को यह संदेश दिया कि जब जनता अन्याय के खिलाफ खड़ी हो जाए, तो साम्राज्य भी ढह जाते हैं।
आज भी प्रेरणा देता है क्रांति दिवस
10 मई का दिन हमें सिर्फ इतिहास याद करने के लिए नहीं, बल्कि उन बलिदानों से प्रेरणा लेने के लिए भी है, जिन्होंने हमें स्वतंत्र भारत दिया। आज जब देश आज़ादी का अमृतकाल मना रहा है, तब 1857 के वीरों का स्मरण और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। क्रांति दिवस हमें याद दिलाता है कि स्वतंत्रता त्याग, संघर्ष और बलिदान से हासिल होती है। यह दिन उन अमर सेनानियों को श्रद्धांजलि देने का अवसर है, जिनकी कुर्बानियों ने भारत की आज़ादी की राह तैयार की।
