18वीं सदी में जब भारत पर अंग्रेज़ी साम्राज्यवाद की जड़ें फैलनी शुरू हो चुकी थीं, तब दक्षिण भारत के मैसूर राज्य में एक ऐसा शासक पैदा हुआ। जिसने अंग्रेजों के सामने कभी घुटने नहीं टेके। वह थे – सुल्तान फ़तेह अली टीपू। उनको इतिहास ने ‘टीपू सुल्तान’ के नाम से अमर कर दिया।उनकी आज वरसी (पुण्यतिथि) है। हालांकि, टीपू सुल्तान का जन्म 1 दिसंबर 1751 को मैसूर राज्य के देवनहल्ली में हुआ था। उनके पिता हैदर अली, एक कुशल सेनापति थे। जिन्होंने अपनी वीरता के बल पर मैसूर की सत्ता संभाली थी। टीपू को बचपन से ही प्रशासन, युद्धनीति और विभिन्न भाषाओं में गहरी रुचि थी। उन्होंने फ़ारसी, कन्नड़, उर्दू और अरबी भाषाओं में दक्षता प्राप्त की। साथ ही विज्ञान, ज्योतिष, संगीत, इंजीनियरिंग और धर्मशास्त्र में भी उनकी गहरी रुचि थी। महात्मा गांधी भी टीपू सुल्तान की धर्मनिरपेक्षता से प्रभावित थे और उन्हें “शेर के जीवन का एक दिन सियार के 100 साल से बेहतर” कहकर श्रद्धांजलि दी थी।
राजनीतिक दूरदर्शिता और सैन्य कौशल
1782 में पिता की मृत्यु के बाद जब टीपू सुल्तान गद्दी पर बैठे, तब दक्षिण भारत अंग्रेजों के प्रभाव में तेजी से आ रहा था। उन्होंने अपने शासनकाल में कई प्रशासनिक और सैन्य सुधार किए — एक नई भूमि व्यवस्था, नई मुद्रा प्रणाली, कैलेंडर सुधार और खासकर लौह-आवरण वाले मैसूरी रॉकेट, जो उनकी सेना की सबसे प्रभावशाली तकनीकों में शामिल थे। फतुल मुजाहिदीन नामक सैन्य मैनुअल द्वारा उन्होंने अपनी सेना को सुव्यवस्थित किया। पोलिलूर की लड़ाई और श्रीरंगपट्टन की घेराबंदी में इन रॉकेटों का प्रभावी इस्तेमाल अंग्रेज आज भी याद करते हैं।
केवल योद्धा नहीं, एक प्रगतिशील शासक

टीपू सुल्तान केवल योद्धा नहीं, एक प्रगतिशील शासक भी थे। उन्होंने कर्नाटक के किसानों को ज़मीन का मालिक बनाया। सामंतवाद को जड़ से उखाड़ा और कृषि को नई दिशा दी। आज भी पूर्व मैसूर क्षेत्र के किसान अन्य क्षेत्रों की तुलना में अधिक आत्मनिर्भर हैं — यह उन्हीं की दूरदर्शिता का परिणाम है। उन्होंने चन्नापटना खिलौनों के विकास को भी प्रोत्साहित किया, जो आज “GI टैग” प्राप्त भारतीय हस्तशिल्प का गर्व हैं।
धर्मनिरपेक्षता और समावेशी नेतृत्व
हालाँकि, टीपू पर धार्मिक कट्टरता के आरोप लगे हैं, फिर भी ऐतिहासिक दस्तावेज़ कुछ और ही गवाही देते हैं। उन्होंने श्रीरंगपट्टन के हिंदू मंदिरों को संरक्षण दिया। श्रीगंगातट के जगतगुरु स्वामी को पत्र लिखकर उनके आशीर्वाद की कामना की और वक्फ ट्रस्टों के साथ हिंदू मंदिरों को समान सहयोग दिया। भारतीय पुरातत्व विभाग में संरक्षित उनके 30 से अधिक पत्र उनकी धार्मिक सहिष्णुता के प्रमाण हैं।
औपनिवेशिक शक्तियों से संघर्ष
टीपू सुल्तान ने चार एंग्लो-मैसूर युद्धों में हिस्सा लिया। उन्होंने फ्रांसीसियों से कूटनीतिक संबंध बनाए, ताकि अंग्रेजों के विरुद्ध सशक्त मोर्चा खड़ा किया जा सके। 1792 की श्रीरंगपट्टन संधि में हार के बाद उन्होंने आधा राज्य, 30 लाख पौंड और अपने दो पुत्रों को बंधक के रूप में देना स्वीकार किया। किंतु, आत्मसम्मान से समझौता नहीं किया 4 मई 1799, श्रीरंगपट्टन की अंतिम लड़ाई में उन्होंने शेर की भांति लड़ते हुए वीरगति पाई। अंग्रेजों के लिए वह ‘भारत का नेपोलियन’ थे — साहसी, दूरदर्शी और निडर।
सांस्कृतिक धरोहर और बौद्धिक संपदा
टीपू सुल्तान की लाइब्रेरी में लगभग 2,000 से अधिक ग्रंथ थे। इसमें धर्म, इतिहास, गणित, संगीत, ज्योतिष और दर्शन जैसे विविध विषय शामिल थे। उन्होंने खुद सुलेख पर “रिसाला-ए-ख़त-ए-मुहम्मदी” नामक ग्रंथ और ज्योतिष पर “ज़बरजद” की रचना की। उनका साप्ताहिक उर्दू बुलेटिन इस बात का प्रमाण है कि वह उर्दू पत्रकारिता के अग्रदूतों में शामिल थे।
“मैसूर का बाघ” – बहादुरी, प्रगति और विवाद का प्रतीक
हर साल जब टीपू सुल्तान की जयंती आती है, तो भारत में एक ऐतिहासिक बहस फिर से छिड़ जाती है—क्या वह भारत के पहले स्वतंत्रता सेनानियों में से एक थे, या एक धार्मिक कट्टर शासक, जिनकी विरासत विवादास्पद है? “मैसूर का बाघ” के नाम से विख्यात टीपू सुल्तान की कहानी बहादुरी, प्रगतिशील शासन और टकरावों की मिश्रित धरोहर है। वह न केवल एक योद्धा थे, बल्कि एक दूरदर्शी प्रशासक भी थे। उनका व्यक्तिगत जीवन और प्रशासनिक निर्णय भी अनुशासन और नैतिकता से भरे थे। शराब, वेश्यावृत्ति और भांग जैसे नशीले पदार्थों पर सख्ती, और भूमि कर प्रणाली में सुधार, उनके जनकल्याणकारी दृष्टिकोण को दर्शाते हैं। उन्होंने मैसूर रेशम उद्योग की नींव रखी और कावेरी नदी पर केआरएस बांध की योजना शुरू की।
