लखनऊ : भारत का संविधान सामाजिक न्याय, समानता और अवसर की गारंटी देता है। खासकर उन तबकों के लिए जो सदियों तक हाशिए पर रहे हैं। अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC)। इन समुदायों के लिए सरकारी नौकरियाँ और सार्वजनिक क्षेत्र आर्थिक, सामाजिक और मानसिक स्वतंत्रता का आधार बने। ऐसे में आज जिस रफ्तार से सरकारी क्षेत्र का निजीकरण हो रहा है। उसे महज़ आर्थिक सुधार कहना नासमझी होगी। यह सामाजिक न्याय के ढांचे पर सीधा हमला है। यह कहना है समाजसेविका और सामाजिक न्याय के मुद्दों पर लिखने वाली डॉ. रंजना यादव का, उन्होंने कहा कि सरकार की मंशा ईमानदार होती, तो वह निजी क्षेत्र में निम्नलिखित चार बुनियादी संरचनाएं लागू करती। इसमें आरक्षण की संवैधानिक गारंटी, वेतन और सेवा की समानता, जातिगत भेदभाव से सुरक्षा और सेवा सुरक्षा की व्यवस्था होनी चाहिए थी
दक्षता की आड़ में अधिकारों की कटौती
उन्होंने कहा कि सरकार का दावा है कि निजीकरण से दक्षता बढ़ती है, लेकिन डॉ. रंजना यादव के अनुसार यह सवाल उठना जरूरी है। यह दक्षता किसकी कीमत पर हासिल की जा रही है? यदि निजी कंपनियों में आरक्षण की कोई संवैधानिक गारंटी नहीं, सेवा सुरक्षा नहीं, समान वेतन नहीं और जातिगत भेदभाव के खिलाफ सुरक्षा का कोई तंत्र नहीं, तो यह साफ है कि निजीकरण वंचित समुदायों को हाशिए पर धकेलने का एक संगठित तरीका बन चुका है। इन सभी की अनुपस्थिति यह सिद्ध करती है कि यह केवल आर्थिक निर्णय नहीं, बल्कि सामाजिक पुनर्गठन का एक असंतुलित मॉडल है।
सरकारी नौकरियाँ:, समानता का प्रवेश द्वार
सरकारी नौकरियाँ SC, ST और OBC समुदायों के लिए केवल रोजगार नहीं थीं। यह सम्मान, सुरक्षा और आत्मविश्वास का प्रवेश द्वार थीं। पहली पीढ़ी के लाखों युवाओं ने इन्हीं के माध्यम से शिक्षा और स्थायित्व प्राप्त किया। लेकिन निजी क्षेत्र अब भी एक ऐसा क्षेत्र है जहाँ जाति आधारित भेदभाव भले ही खुले तौर पर न हो, लेकिन उसकी संरचनात्मक उपस्थिति गहराई से जड़ें जमाए हुए है।
निजीकरण से बहुसंख्यक वंचित वर्ग के अधिकारों पर हमले का ज़रिया
यदि सरकार सामाजिक असमानता को दूर करने की बजाय उस मॉडल को प्रोत्साहित करती है, जो समाज को और अधिक असमान बनाता है, तो यह निष्पक्ष शासन नहीं, बल्कि सत्ता का वर्ग विशेष के पक्ष में झुकाव दर्शाता है। डॉ. यादव का स्पष्ट कहना है, “जब तक निजी क्षेत्र में संविधान प्रदत्त अधिकारों की गारंटी नहीं होती, तब तक निजीकरण केवल जनविरोधी और वर्गविरोधी नीति मानी जानी चाहिए।”
PDA (पिछड़ा-दलित-आदिवासी) एकता से प्रतिरोध से पुनर्निर्माण तक
निजीकरण के विरोध में PDA वर्गों की एकता अब नारेबाज़ी तक सीमित नहीं रही। यह एक वैचारिक, राजनीतिक और सामाजिक आंदोलन का रूप ले चुका है, जो देश को यह बता रहा है कि बिना सामाजिक न्याय के कोई भी आर्थिक सुधार अब स्वीकार्य नहीं है। “PDA विरोधी निजीकरण हो बर्बाद” जैसे नारे, अब एक नई सामाजिक चेतना और आत्म-सम्मान की आवाज बन चुके हैं।
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