राजस्थान विधानसभा के स्पीकर ने बरेली सर्किट हाउस के गवर्नर सूट्स को छोड़ दिया एहतराम में, 55 साल बाद भी वसीम बरेलवी नहीं भूले याद-ए- ग़ालिब मुशायरा
बरेली की सरज़मीन से जब कोई अदबी आवाज़ उठती है, तो उसमें तासीर होती है और जब वसीम बरेलवी जैसे अंतर्राष्ट्रीय शायर कैफ़ी आज़मी को याद करते हैं, तो वह सिर्फ़ एक शायर को नहीं, एक अदबी नजरिए को सलाम होता है। कैफ़ी आज़मी का ज़िक्र करना महज़ उर्दू शायरी के एक अहम नाम को याद करना नहीं, बल्कि एक ऐसी शख़्सियत की बात करना है। जिसने अपनी लेखनी से तख़्तों-ताज हिलाए, और अपनी संवेदना से समाज की आत्मा को छुआ। जिनके लिए कविता महज़ तसव्वुर नहीं, एक ज़िम्मेदारी थी और ज़माने की बेहतरी के लिए। आज यानी 10 मई को मरहूम कैफ़ी आजमी साहब की वरसी (पुण्यतिथि) है। देश भर में उनको खिराज-ए-अकीदत (श्रद्धांजलि) पेश की जा रही हैं। मगर, उनके बरेली में पहली बार आने का किस्सा 55 साल बाद भी प्रो.वसीम बरेलवी साहब नहीं भूले।
कैफ़ी आजमी का रूम बदलने के बजाय राजस्थान के स्पीकर ने लिया पेर छूकर आशीर्वाद
अंतर्राष्ट्रीय शायर प्रोफेसर वसीम बरेलवी बताते हैं कि वर्ष 1969- 70 में बरेली के जिला जज फैय्याज हुसैन शाह ने बरेली में ऑल इंडिया मुशायरा याद-ए-ग़ालिब के आयोजन का फैसला लिया था। मगर, इसकी जिम्मेदारी मुझको दी गई। इस ऑल इंडिया मुशायरे में देश भर के नामचीन शायर को आमंत्रित किया गया। उसमें अपने दौर के अहमतरीन शायर कैफ़ी आजमी साहब को भी दावत दी गई। मुशायरे की प्रबंधन समिति में शहर के प्रशासनिक अधिकारी भी शरीक थे और शायरों की मेहमान नवाजी में लगे थे। कैफ़ी आजमी साहब एक दिन पहले आ गए थे और उनके आने पर सर्किट हाउस के गवर्नर सूट्स में ठहराया गया। दूसरे दिन मुशायरा था।सब इंतजामात में लगे हुए थे कि इसी दौरान बरेली के तत्कालीन सिटी मजिस्ट्रेट घबराए हुए आए और परेशान होकर मुझसे बोले कि अभी इत्तिला मिली है कि राजस्थान के विधानसभा स्पीकर नैनीताल में कल आयोजित होने वाली ऑल इंडिया स्पीकर कॉन्फ्रेंस में शामिल होने से पहले बरेली सर्किट हाउस में रुकेंगे। नियमानुसार सर्किट हाउस का गर्वनर सूट्स में ठहराना होगा। आप तुरंत चलिए और कैफ़ी साहब से बात कर रुम चेंज करा दीजिए। मगर, मैं माथुर साहब की बात सुनकर परेशान हो गया। क्योंकि, कैफ़ी साहब से कैसे गवर्नर सूट्स छोड़कर किसी और रूम में चलने को कह पाऊंगा। इसी परेशानी में हम दोनों सर्किट हाउस के लिए चल दिए, रास्ते में मैने नाम पूछा, तो उन्होंने राजस्थान के विधानसभा के स्पीकर का नाम निरंजन नाथ आचार्य बताया। इस पर मैने कहा आप परेशान मत हों। क्योंकि, मैं उन्हें जनता हूं। मेरी उनसे उदयपुर में एक मुशायरा के दौरान मुलाकात हुई थी। उस वक्त वह राजस्थान सरकार में मिनिस्टर थे। उन्होंने मुशायरे के अगले दिन घर पर चाय के लिए मुझे आमंत्रित किया। वह बहुत अच्छे व्यक्तित्व के लिखने पढ़ने वाले व्यक्ति थे। चाय पीने के बाद मुझे एक किताब “बिखरे पात” दी। किताब देने के दौरान उन्होंने बरेली में अपने दोस्त “खान साहब” से सलाम अर्ज करने की बात कही। उन्होंने बताया कि सर्किट हाउस के एक खानसामा मिस्टर खान हैं, जो मेरे दोस्त हैं। उनकी बात सुनकर मुझे भी सर्किट हाउस के खानसाहब के बारे में जानने की ख्वाहिश हुई, तब उन्होंने बताया कि मैं एक बार नैनीताल जा रहा था और सुबह उठने के बाद मैंने वहां के कर्मचारियों की खिदमत को कुछ नजराना देना चाहा। वहां के सभी कर्मचारियों ने ले लिया, लेकिन मिस्टर खान ने मेरी खिदमत को कुबूल नहीं किया। मैंने काफी कोशिश की, तो बोले आपकी खिदमत करना मेरी सरकारी ड्यूटी है। इसका मुझे सरकार पैसा देती है। उनसे काफी कोशिश की लेकिन उन्होंने एक भी रुपया नहीं लिया। मैं उनसे जितनी बात कर रहा था। वह बातों में मुझे से बहुत बड़े होते जा रहे थे, और मैं छोटा। लेकिन उसके बाद मैंने उनको दोस्ती के लिए ऑफर किया, तो उन्होंने कहा कि मैं बहुत छोटा मुलाजिम हूं, और आप कहां। इसलिए दोस्ती भी नहीं हो सकती। मगर, मैं उनसे लगातार जुड़ा रहा और आज वह मेरे दोस्त हैं, और जो किताब मैंने आपको दी है। इस किताब में मेरे जीवन के 10 नाइस कैरेक्टर (जीवन खाता) हैं। उन्हीं में से एक उनका भी खाता है। उसको पढ़िएगा। इसके बाद मैं उनसे काफी मुतासिर (प्रभावित) हुआ। मैं सर्किट हाउस में उनके बारे में चर्चा कर रहा था, इतनी देर में स्पीकर साहब आ गए। स्पीकर साहब की उतरते ही उनकी पहली नजर मुझ पर पड़ी, और बोले आप कैसे ?। मैंने कहा कि मैं आपके इस्तकबाल को खड़ा हूं। उन्होंने काफी सम्मान दिया, जब अंदर पहुंचे, तो उनको बताया कि आज यहां ऑल इंडिया मुशायरा है, आपको इसमें रहना है। उन्होंने कहा कि मुझे सुबह 10 बजे कांफ्रेंस में पहुंचना है। इसलिए सुबह जल्दी निकालना है, लेकिन वह फिर भी तैयार हो गए। वहां सभी अधिकारी मौजूद थे। मैं उनको अलग में ले गया। उनको गवर्नर सूट्स में कैफ़ी आजमी साहब के ठहरने की बात बताने के साथ ही किस तरह से खाली कराया जाए। यह मजबूरी भी बताई। इस पर विधानसभा स्पीकर साहब ने कहा कि अरे इसमें परेशान होने की कोई जरूरत नहीं, मैं तो कहीं रुक जाऊंगा, लेकिन काफी साहब का बड़ा सम्मान है। मैं उनका बहुत सम्मान करता हूं और जल्दी से चलकर मुझे उनके दर्शन करा दीजिए। इसके बाद प्रशासन के अफसरों ने राहत की सांस ली। उन्होंने कैफ़ी आजमी साहब के पैर छूकर आशीर्वाद लिया। उस समय साहित्यकारों लेखकों और शायरों की कितनी इज्जत हुआ करती थी। यह मुझे उस दिन एहसास हुआ। कैफ़ी आजमी साहब के फन और शख्सियत पर प्रो.वसीम बरेलवी साहब के निर्देशन में डॉक्टर नजावत अदीब ने शोध कार्य किया है। उनको एमजेपी रुहेलखंड यूनिवर्सिटी से पीएचडी डिग्री मिली है।
पिता बनाना चाहते थे मौलवी, लेकिन कैफ़ी आजमी को बनना था शायर
मिजवां का एक नौजवान, जो मौलवी बनने के रास्ते पर चलाया गया,लेकिन जिसकी आत्मा को शायरी ने पुकारा। 12 साल की उम्र में जो कलम थामी, तो वो फिर कभी नहीं छूटी। बेगम अख़्तर से लेकर सिनेमा के परदे तक, उनकी ग़ज़लें एक पुल बन गईं — अदब और आम आदमी के दर्द के बीच। कैफ़ी आज़मी की नज़्में आज भी सवाल करती हैं, औरत को लेकर, मज़दूर की हालत को लेकर, समाज की बेइंसाफ़ी को लेकर। जब उन्होंने लिखा “उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे”, तो वो महज़ एक पंक्ति नहीं थी, बल्कि एक आंदोलन की पुकार थी। उनकी शायरी ने इंकलाब को नज़्म दी, और जमीर को आवाज़।
एक जागती हुई आत्मा की आवाज़
14 जनवरी 1919 को आज़मगढ़ के मिजवां गांव में जन्मे सैय्यद अख्तर हुसैन रिजवी उर्फ कैफ़ी आज़मी का सफ़र एक कवि से क्रांतिकारी तक फैला हुआ था। घर में मीर अनीस के मर्सिए गूंजते थे, बहनें कानों में शायरी घोलती थीं, और भाई कहते थे, “पान लेकर आओ”, लेकिन इस नन्हे शायर की आत्मा कहती थी — “मैं भी शायर बनूंगा”। 12 साल की उम्र में पहली ग़ज़ल लिखी, जिसे बेगम अख़्तर ने अपनी आवाज़ दी, और फिर यह सिलसिला रुका नहीं।
कलम से इंकलाब तक
कैफ़ी साहब ने अपने वक़्त की सियासी और सामाजिक बुनावट को अपनी नज़्मों से झिंझोड़ दिया। ‘औरत’ जैसी नज़्मों से उन्होंने पितृसत्ता की दीवारों में सुराख़ किए। ट्रेड यूनियन की बैठकों में अपनी नज़्मों के ज़रिए मज़दूरों की आवाज़ बने। “मैं ढूंढता हूं जिसे वो जहां नहीं मिलता” — उनके अशआर आत्मा की तलाश भी थे और जमाने की सूरत का आईना भी।
मुंबई से मिजवां तक — एक इंकलाबी वापसी
जब उम्र उस पड़ाव पर थी, जहाँ ज़्यादातर लोग सुकून चाहते हैं, कैफ़ी साहब गांव लौट आए। उन्होंने कहा, “मैं इस मिट्टी का कर्ज़ उतारने आया हूं”। स्कूल, अस्पताल, सड़क, उन्होंने मिजवां को संवारने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उनके लिए कविता सिर्फ़ लफ़्ज़ नहीं, ज़िम्मेदारी थी।
सिनेमा में संवेदना की ज़बान
कैफ़ी साहब का योगदान सिनेमा को भी एक नई आत्मा दे गया। ‘गर्म हवा’ जैसी फिल्मों की पटकथा और ‘वक़्त ने किया क्या हसीं सितम’, ‘या दिल की सुनो’, ‘ये दुनिया ये महफ़िल’ जैसे गीतों से उन्होंने परदे को भी कविता का एक रंग दिया।
एक प्रेम कथा, जो दो कलाकारों की साझी उड़ान बनी
शौकत आज़मी के साथ उनका रिश्ता अद्वितीय था। संवेदनाओं और विचारों से गढ़ा हुआ। शौकत ने एक क्रांतिकारी लेखक को सिर्फ़ प्रेम ही नहीं दिया, बल्कि उसके संघर्ष में भी कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी रहीं।
निज़ाम के दरबार में बग़ावत, और शौकत का दिल जीतना
हैदराबाद में निज़ाम के दरबार में जब उन्होंने बग़ावत की ग़ज़ल पढ़ी, तो न सिर्फ़ सत्ता चौंकी, बल्कि शौकत कैफ़ी भी इस rebel poet के प्रेम में पड़ गईं। इस बग़ावत ने उन्हें मोहब्बत दी, और मोहब्बत ने ज़िंदगी को मक़सद।
अंतिम अल्फ़ाज़ में एक तर्ज़-ए-हयात
10 मई, 2002 में उन्होंने विदा लेते हुए यही गुनगुनाया “ये दुनिया, ये महफ़िल मेरे काम की नहीं”। लेकिन इस दुनिया के काम वो बहुत आ चुके थे — अपने लेखन, विचार और कर्म से।
