शहनाई से आज़ादी का इस्तक़बाल करने वाले भारत रत्न, इंडिया गेट पर शहीदों के नाम शहनाई बजाने की अधूरी रह गई ख़्वाहिश
मुहम्मद साजिद
उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ां का नाम लेते ही कानों में शहनाई की वो मधुर तान गूंज उठती है, जिसने भारत की आज़ादी का इस्तक़बाल किया था। 14 अगस्त 1947 की रात, जब लाल क़िले से पंडित नेहरू ने ऐतिहासिक भाषण “Tryst with Destiny” दिया, तो उसके बाद उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ां ने अपने साथियों संग राग काफ़ी बजाकर भारत की पहली सुबह का इस्तकबाल (स्वागत) किया। यही वह लम्हा था, जब शहनाई सिर्फ़ एक वाद्ययंत्र नहीं रही, बल्कि मुल्क की पहचान बन गई। आज यानी 21 अगस्त को उस्ताद बिस्मिल्लाह खां की बरसी (पुण्यतिथि) है। मगर, उनकी शहनाई की धुन आज भी हर भारतीय के दिमाग (नास्तिक) में गूंजती है। हालांकि, उनका जन्म (यौम ए पैदाइश) 21 मार्च, 1916 यानी गुलाम भारत में बिहार के डुमरांव में हुआ था। घर में उनका नाम कमरुद्दीन, जो बाद में बिस्मिल्लाह हो गया। वह बचपन से ही सुरों में रमे रहते थे।
बनारस के नाम में रस
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उस्ताद बिस्मिल्लाह खां कहना था “अगर किसी को सुरीला बनना है, तो बनारस चला आए, गंगा जी के किनारे बैठ जाए… बनारस के नाम में ही रस है।”बिस्मिल्लाह ख़ां का बनारस से ऐसा इश्क़ था कि अमरीका में बसने का ऑफ़र भी यह कहकर ठुकरा दिया। बोले, “मेरी गंगा कहां से लाओगे? मेरी काशी कहां से लाओगे?”
शहनाई को दिलाई मुकम्मल पहचान
ख़ां साहब ने शहनाई को सिर्फ़ शादी-ब्याह का वाद्ययंत्र नहीं रहने दिया, बल्कि उसे शास्त्रीय संगीत के मंच पर ले आए। शांति निकेतन और बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी ने उन्हें डॉक्टरेट की उपाधि दी। इतिहासकार लिखते हैं कि उन्होंने गंगा-जमुनी तहज़ीब को भी मज़बूती दी। कभी बाबा विश्वनाथ मंदिर में शहनाई बजाते, तो कभी ईद-मीलाद और मुहर्रम की मजलिसों में, उनके लिए “संगीत ही धर्म” था।
1961 में पद्मश्री, और 2001 में भारत रत्न
उस्ताद ने शहनाई को दुनिया भर में पहचान दिलाई थी। मगर, इसमें बाद शहनाई ने उन्हें देश से लेकर दुनिया में सम्मान दिलाया। भारत सरकार ने 1961 पद्मश्री, 1968 में पद्म भूषण, 1980 में पद्म विभूषण, और 2001 में भारत रत्न मिला। इतने बड़े सम्मान के बावजूद सादगी उनकी पहचान थी। एक बार टीवी इंटरव्यू में फटी लुंगी पहनकर बैठे रहे। जब शिष्या ने टोका तो बोले-“इज़्ज़त लुंगी से नहीं, सुरों से मिलती है।”
इंडिया गेट पर शहीदों के नाम शहनाई बजाने की अधूरी ख़्वाहिश
ज़िंदगी के आख़िरी दिनों में उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ां की तमन्ना थी कि वे दिल्ली के इंडिया गेट पर शहीदों के नाम शहनाई बजाएं। मगर, ये ख्वाहिश पूरी न हो सकी। 21 अगस्त 2006 को उनका इंतक़ाल हुआ, और उन्हें उनके साथियों ने उनकी प्यारी शहनाई के साथ दफ़्नाया।
