जब भी भारत के सैन्य इतिहास में राष्ट्रप्रेम, बलिदान और धर्मनिरपेक्षता की बात होगी, एक नाम सबसे पहले लिया जाएगा। वह नाम है ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान का। वे न सिर्फ आज़ाद भारत की सीमाओं की रक्षा करने वाले पहले उच्च सैन्य अधिकारी थे। जिन्होंने युद्ध में प्राण न्योछावर किए, बल्कि उन्होंने उस समय धर्म और देश के बीच देश को चुना, जब पूरे उपमहाद्वीप में बंटवारे की आग फैली हुई थी।
नौशेरा के शेर की 15 जुलाई को यौम-ए-पैदाइश
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ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान का जन्म 15 जुलाई 1912 को उत्तर प्रदेश के मऊ जिले के बीबीपुर गांव में हुआ। उनका परिवार प्रतिष्ठित ज़मींदार पृष्ठभूमि से था, जो यूसुफपुर के प्रसिद्ध ‘अंसारी’ खानदान से ताल्लुक रखता था। इस खानदान ने सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्रों में हमेशा उल्लेखनीय भूमिका निभाई। जिनमें डॉ. मुख्तार अहमद अंसारी, फ़रीदुल हक अंसारी, पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी, और विधायक मुख्तार अंसारी जैसे नाम प्रमुख हैं। उनके पिता मोहम्मद फारूक खुनामबीर और माता जमीलुन बीबी थीं। प्रारंभिक शिक्षा वाराणसी के हरीश चंद्र स्कूल में हुई।
12 वर्ष की उम्र में बच्चे की जान बचाने को कुएं में लगाई छलांग
बचपन में ही उनका साहसिक स्वभाव स्पष्ट हो गया था। मात्र 12 वर्ष की उम्र में उन्होंने एक बच्चे की जान बचाने के लिए कुएं में छलांग लगा दी थी। बचपन से ही सेना में जाने का सपना देखने वाले उस्मान ने ब्रिटिश दौर में भारतीयों के लिए सीमित सैन्य पदों की कठिन चुनौती को पार करते हुए 1932 में रॉयल मिलिट्री कॉलेज, सैंडहर्स्ट (इंग्लैंड) में प्रवेश लिया। 1 फरवरी 1934 को उन्हें द्वितीय लेफ्टिनेंट के रूप में कमीशन मिला और भारतीय सेना की असंबद्ध सूची में शामिल किया गया। बाद में उन्होंने कैमरूनियन राइफल्स की पहली बटालियन में एक वर्ष की सेवा दी और फिर भारतीय इकाइयों के साथ कमान सँभालते हुए अपने नेतृत्व कौशल से पहचाने जाने लगे।
बंटवारे के समय चुना भारत
1947 में भारत का विभाजन केवल ज़मीन का नहीं, आत्माओं और निष्ठाओं का भी हुआ। कई मुस्लिम सैन्य अधिकारी पाकिस्तान चले गए। लेकिन ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान ने पाकिस्तान द्वारा मेजर जनरल बनाने के प्रस्ताव को यह कहते हुए ठुकरा दिया कि “मेरे लिए मेरा देश ही सबसे ऊपर है।”उन्होंने भारतीय सेना में बने रहने का फैसला किया। इस निर्णय ने उन्हें केवल एक वीर सैनिक नहीं, बल्कि भारत की धर्मनिरपेक्ष भावना का जीवंत प्रतीक बना दिया।
नौशेरा की लड़ाई और ‘नौशेरा का शेर’
1947-48 में जब पाकिस्तान समर्थित कबायलियों और सैनिकों ने जम्मू-कश्मीर पर हमला किया, उस्मान ने 50 पैरा ब्रिगेड की कमान संभाली। उन्होंने झांगर और नौशेरा जैसे रणनीतिक ठिकानों की रक्षा में अद्वितीय सैन्य चातुर्य और साहस का प्रदर्शन किया। फरवरी 1948 में उन्होंने नौशेरा को दुश्मन से बचाने में निर्णायक भूमिका निभाई। यही कारण है कि उन्हें “नौशेरा का शेर” कहा जाने लगा। उनका यह अभियान भारतीय सेना की शुरुआती सफलताओं में से एक था, जिसने जम्मू-कश्मीर को भारत में बनाए रखने की नींव रखी।
मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित
3 जुलाई 1948 को एक तोप का गोला उनके निकट आकर फटा। जिससे वे शहीद हो गए। ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान भारतीय सेना के अब तक के सबसे उच्च रैंकिंग अधिकारी हैं जो युद्ध क्षेत्र में शहीद हुए। उनके इस बलिदान के लिए उन्हें मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया गया। यह भारत का दूसरा सर्वोच्च वीरता पुरस्कार है। उनका अंतिम संस्कार दिल्ली के ओखला कब्रिस्तान में सैन्य सम्मान के साथ किया गया। जिसमें तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू और अन्य शीर्ष नेता उपस्थित थे।
जामिया मिल्लिया यूनिवर्सिटी के परिसर में कब्र
ब्रिगेडियर उस्मान की याद में दिल्ली में एक सड़क और स्मारक मौजूद हैं। 2012 में उनकी जन्म शताब्दी भारतीय सेना ने झांगर (जम्मू-कश्मीर) में मनाई और गोरखा रेजीमेंट ने उन्हें श्रद्धांजलि स्वरूप पैरामोटर अभियान भी आयोजित किया। उनकी कब्र दिल्ली की जामिया मिल्लिया यूनिवर्सिटी परिसर में है। आज जब समाज में धर्म और पहचान को लेकर गहराता ध्रुवीकरण दिखता है, तो वहीं ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान का जीवन हमें एक आदर्श राष्ट्रीय चरित्र का मार्ग दिखाता है। वे मुसलमान थे, पर उनकी पहचान सबसे पहले एक भारतीय सैनिक की थी। वे उस दौर में भी धर्मनिरपेक्ष भारत की आवाज़ बने, जब धर्म के नाम पर देश टूट रहा था। उनकी कहानी यह कहती है कि “मज़हब मेरा हो सकता है, पर मेरी जान इस तिरंगे की है।”
