संजीव मेहरोत्रा
महामंत्री
बरेली ट्रेड यूनियंस फेडरेशन
भारत के स्वतंत्रता संग्राम की क्रांतिकारी परंपरा में शहीद ऊधम सिंह का नाम एक अमिट लकीर की तरह दर्ज है। वे न सिर्फ एक क्रांतिकारी थे, बल्कि एक ऐसे सेनानी भी, जिन्होंने इंसाफ के लिए 21 वर्षों तक इंतजार किया, और फिर ब्रिटिश धरती पर जाकर जलियांवाला बाग के दोषी को सज़ा दी।
जलियांवाला बाग से शुरू हुई प्रतिज्ञा
13 अप्रैल 1919 को अमृतसर के जलियांवाला बाग में ब्रिटिश अफसर जनरल डायर के आदेश पर सैकड़ों निहत्थे लोगों को गोलियों से भून दिया गया। उस नरसंहार की छाया में एक 19 वर्षीय युवक ज़ख्मी पड़ा था। वही था ऊधम सिंह। मगर, उसकी आंखों में आंसू नहीं, बदले की आग थी। उधम सिंह जानते थे कि जनरल डायर केवल एक मोहरा था, असली साज़िशकर्ता था पंजाब का लेफ्टिनेंट गवर्नर माइकल ओ’ड्वायर, जिसने डायर को नरसंहार की खुली छूट दी थी।
21 साल बाद, लंदन में किया हिसाब
13 मार्च 1940 को, लंदन के Caxton Hall में ‘East India Association’ की मीटिंग चल रही थी। जिसमें माइकल ओ’ड्वायर भी मौजूद था। अचानक सभा के बीच में, ऊधम सिंह ने पिस्तौल निकाली और ओ’ड्वायर को मौके पर ही मौत के घाट उतार दिया। उन्होंने भागने की कोशिश नहीं की। गिरफ्तारी के समय जब नाम पूछा गया, तो गरजकर बोले “मेरा नाम है राम मोहम्मद सिंह आज़ाद!”यह नाम भारत के तीन धर्मों हिंदू, मुस्लिम और सिख की एकता का प्रतीक था, और “आज़ाद” उस भावना का, जिसके लिए उन्होंने जान दी।
सुनवाई, भूख हड़ताल और ऐतिहासिक बयान
ब्रिटिश अदालत में जब उनसे पूछा गया कि उन्होंने ऐसा क्यों किया, तो ऊधम सिंह ने साफ कहा कि “मैंने ऐसा इसलिए किया क्योंकि वो इसके लायक था। मैंने 21 साल तक बदला लेने की योजना बनाई। मैं अपने देश की आज़ादी के लिए मर रहा हूँ। मुझे कोई पछतावा नहीं।”सुनवाई के दौरान उन्होंने 42 दिनों की भूख हड़ताल की, और अंततः उन्हें 31 जुलाई 1940 को लंदन की पेंटनविले जेल में फांसी दे दी गई।
बलिदान दिवस और राष्ट्र की श्रद्धांजलि
31 जुलाई को भारत भर में ऊधम सिंह बलिदान दिवस के रूप में याद किया जाता है। इस वर्ष, पंजाब सरकार ने इस दिन राजकीय अवकाश की घोषणा कर उनके सम्मान को औपचारिक रूप दिया।
