वरिष्ठ कवि और पूर्व सांसद डॉ. उदय प्रताप सिंह ने कविता के जरिए लोकतांत्रिक व्यवस्था में धनबल, तिकड़म और बाहुबल के प्रभाव पर उठाए सवाल, जानिए कौन हैं ‘गुरुजी’ उदय प्रताप सिंह
मुहम्मद साजिद
लखनऊ : देश के जाने-माने कवि, साहित्यकार और पूर्व सांसद डॉ. उदय प्रताप सिंह एक बार फिर अपनी कविता को लेकर चर्चा में हैं। समाजवादी चिंतन से जुड़े डॉ. सिंह ने लोकतंत्र और सवाल पूछने की स्वतंत्रता को केंद्र में रखते हुए नई पंक्तियां लिखी हैं। उनकी नई कविता की पंक्तियां हैं—“पैसा, तिकड़म, बाहुबल के आश्रित जनतंत्र!उत्तर तब स्वच्छंद हैं, जब सवाल परतंत्र।”इन पंक्तियों में कवि ने लोकतंत्र की उस स्थिति पर सवाल उठाया है, जहां धन, राजनीतिक जोड़-तोड़ और बाहुबल का प्रभाव दिखाई देता है। कविता की दूसरी पंक्ति सवाल पूछने और उनके जवाब देने की लोकतांत्रिक प्रक्रिया की ओर संकेत करती है। डॉ. उदय प्रताप सिंह लंबे समय से अपनी कविताओं के जरिए सामाजिक व्यवस्था, लोकतंत्र, आम आदमी और देश से जुड़े मुद्दों को उठाते रहे हैं।
कौन हैं डॉ. उदय प्रताप सिंह?
18 मई 1932 को उत्तर प्रदेश के मैनपुरी में जन्मे डॉ. उदय प्रताप सिंह हिंदी और उर्दू के वरिष्ठ कवि, साहित्यकार और पूर्व जनप्रतिनिधि हैं। उन्होंने आगरा विश्वविद्यालय के सेंट जॉन्स कॉलेज से हिंदी और अंग्रेजी में एमए किया। छात्र जीवन से ही साहित्य और सामाजिक गतिविधियों में उनकी सक्रियता रही। साहित्य के साथ-साथ उन्होंने सक्रिय राजनीति में भी लंबा सफर तय किया। उपलब्ध जीवनी संबंधी स्रोतों के अनुसार वे 9वीं और 10वीं लोकसभा के सदस्य रहे। इसके बाद वर्ष 2002 से 2008 तक राज्यसभा के सदस्य रहे। वे राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग से भी जुड़े रहे और वर्ष 2012 से 2017 तक उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के अध्यक्ष पद पर रहे।
सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव से गहरा जुड़ाव
डॉ. उदय प्रताप सिंह को समाजवादी आंदोलन और पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के शुरुआती राजनीतिक-सामाजिक जीवन से भी जोड़कर देखा जाता है। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक मुलायम सिंह यादव छात्र जीवन में उदय प्रताप सिंह के विद्यार्थी रहे थे। यही वजह है कि समाजवादी परिवार में उन्हें सम्मान के साथ ‘गुरुजी’ कहकर संबोधित किया जाता रहा है।समाजवादी पार्टी के आधिकारिक बुलेटिन में भी उदय प्रताप सिंह को पूर्व सांसद और वरिष्ठ कवि के रूप में दर्ज किया गया है। जुलाई 2022 में उन्होंने समाजवादी पार्टी के सदस्यता अभियान की शुरुआत के दौरान अखिलेश यादव को पार्टी की सदस्यता दिलाई थी।
कविता से संसद तक पहचान
डॉ.उदय प्रताप सिंह की पहचान केवल राजनीति तक सीमित नहीं है। वे पिछले कई दशकों से कविता और साहित्य के क्षेत्र में सक्रिय हैं। उनकी चर्चित रचनाओं में ‘देखता कौन है?’, ‘शब्द से संसद तक’, ‘तुम्हें सोचता रहा’ और ‘हिंदुस्तान सबका है’ जैसी कृतियां शामिल हैं। उनकी चर्चित कविता ‘हिंदुस्तान सबका है’ की पंक्तियां देश की साझी विरासत, सामाजिक समरसता और एकता के संदर्भ में अक्सर उद्धृत की जाती रही हैं। उनकी कविताओं में सामाजिक सरोकार और व्यवस्था से जुड़े सवाल प्रमुखता से दिखाई देते हैं।
सवाल पूछना लोकतंत्र का शुभ लक्षण
डॉ. उदय प्रताप सिंह पहले भी लोकतंत्र में सवाल पूछने की अहमियत पर अपने विचार रख चुके हैं। वर्ष 2023 में एक बड़े मीडिया हाउस के ‘साहित्य’ के एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा था कि प्रश्न उठना लोकतंत्र का शुभ लक्षण है। इसके साथ ही उन्होंने सवालों को सही संदर्भ और उद्देश्य के साथ देखने की बात कही थी। ऐसे में उनकी नई कविता की पंक्तियों को उनके लंबे साहित्यिक सरोकारों की निरंतरता के तौर पर देखा जा सकता है। हालांकि कविता की व्याख्या पाठक अपने संदर्भ और दृष्टिकोण से कर सकते हैं।
सम्मान और साहित्यिक योगदान
डॉ. उदय प्रताप सिंह को साहित्य और सामाजिक क्षेत्र में योगदान के लिए यश भारती, ब्रज गरिमा सम्मान, डॉ. शिवमंगल सिंह सुमन सम्मान, साहित्य शिरोमणि सहित कई सम्मान मिल चुके हैं। वे हिंदी और उर्दू के बीच संवाद और साझा सांस्कृतिक परंपरा के समर्थक रहे हैं। इस उम्र में भी उनकी सक्रिय साहित्यिक उपस्थिति बनी हुई है। हाल के वर्षों में भी उनकी कविताएं और साहित्यिक विचार सार्वजनिक कार्यक्रमों और सामाजिक विमर्श में चर्चा का विषय रहे हैं।
कविता की नई पंक्तियों ने खींचा फिर ध्यान
डॉ. उदय प्रताप सिंह की नई पंक्तियां छोटी हैं, लेकिन उनका विषय बड़ा है। धनबल, तिकड़म, बाहुबल, लोकतंत्र और सवाल पूछने की आजादी, इन शब्दों के जरिए कवि ने लोकतांत्रिक व्यवस्था को लेकर एक विचार सामने रखा है। यही वजह है कि उनकी नई कविता साहित्यिक दायरे से निकलकर सामाजिक और राजनीतिक विमर्श में भी चर्चा का विषय बन रही है।
