हुस्न, हिज्र और हकीकत के शायर फै़ज़ अहमद फै़ज़ की शायरी में मोहब्बत से आगे का ज़माना
और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा…”उर्दू अदब की इस एक पंक्ति ने जितनी गहराई से इश्क़, इंक़लाब और इंसानियत को जोड़ा। ऐसी मिसाल कम ही शख्सियतों में मिलती है। शायर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ का नाम आज भी उसी शिद्दत और सादगी के साथ लिया जाता है, जैसा उन्हें जानने और सुनने वालों ने महसूस किया। लेखक अली मदीह हाशमी की किताब Love and Revolution में फैज अहमद फैज की जिंदगी पर रोशनी डाली गई है। उनकी शायरी जिंदादिल थी, तो वहीं उनकी सादगी हर किसी को आकर्षित करती थी। हालांकि, शायर फैज अहमद फैज ने जेल की अवधि में दस्ते‑सबा एक प्रमुख काव्य संग्रह लिखा था। इसके साथ ही उनकी ज़िंदाँनामा किताब में कारावास में लिखी नज़र, और मीज़ान, दस्ते ‑तहे‑संग, सरे‑वादिये‑सीना, शामे‑शहरे‑याराँ, मेरे दिल मेरे मुसाफ़िर और नुस्ख़ा‑ए‑वफ़ा को शानदार तरीके से लिखा गया है।
आवाज़ में ठहराव, लफ़्ज़ों में मानी, और कलाम में तहज़ीब : वसीम बरेलवी
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अंतरराष्ट्रीय शायर वसीम बरेलवी बताते हैं कि उनकी पहली मुलाकात फ़ैज़ साहब से मुंबई में एक रंगमंचीय मुशायरे के दौरान हुई थी। “इतने बड़े शायर होकर भी उनमें कोई घमंड नहीं था। आवाज़ में ठहराव, लफ़्ज़ों में मानी, और कलाम में तहज़ीब थी।”
इस मुशायरे में दिलीप कुमार, कैफ़ी आज़मी और सिकंदर बख्त जैसे नामचीन लोग भी मौजूद थे।
जन्म सियालकोट में, जड़ें हिंदुस्तान में
फ़ैज़ का जन्म 13 फ़रवरी, 1911 को तत्कालीन ब्रिटिश भारत के सियालकोट के ‘काला कादर’ गाँव में हुआ था। यह इलाका अब पाकिस्तान में है। मगर, शिक्षा उन्होंने हिंदुस्तान में ली एम.ए. अंग्रेज़ी और अरबी साहित्य में स्नातकोत्तर उपाधियाँ प्राप्त कीं। यही बौद्धिक ज़मीन उनकी शायरी का बुनियादी ताना-बाना बनीं।
इलाहाबाद में एक शायर के लिए रुकी थी ट्रेन
25 अप्रैल 1981 को जब फ़ैज़ इलाहाबाद (प्रयागराज) आए, तो उन्हें सुनने के लिए शहर का हर रिक्शा, तांगा, स्कूटर सीनेट हॉल की ओर दौड़ पड़ा। लेखक रवींद्र कालिया ने लिखा “मुशायरे के बाद जब ट्रेन छूटने वाली थी, तो फ़ैज़ ने कहा कि उन्हें साहित्यकार सादिका शरन से मिलना है।”रेलवे स्टेशन पर स्टेशन मास्टर ने इंकार किया, तो छात्र नेताओं ने धमकी दी कि “हम ट्रैक पर लेट जाएंगे!” ट्रेन रुकी, और पूरे डेढ़ घंटे तक, वो भी सिर्फ एक शायर की ख्वाहिश पूरी करने के लिए।
शादी और वह उधार की अंगूठी
1941 में फ़ैज़ ने एलिस फ़ैज़ से निकाह (शादी) किया। उनकी लिखी किताब के मुताबिक, उस वक्त अंगूठी ख़रीदने को पैसे नहीं थे, तो मियां इफ्तिखारुद्दीन से उधार लिए। निकाह कश्मीर के मशहूर नेता शेख अब्दुल्ला ने पढ़वाया। एक इंक़लाबी की मोहब्बत भी इंक़लाबी अंदाज़ में मुकम्मल हुई।
बंटवारे का ज़ख़्म, और निर्वासन की पीड़ा
जनरल ज़िया उल हक़ के शासनकाल में फ़ैज़ को पाकिस्तान छोड़ना पड़ा। 1977 से लेकर चार साल तक वे बेरूत में निर्वासित रहे। वहाँ उन्होंने फ़लस्तीनी संघर्ष, युद्ध और निर्वासन पर कई कालजयी नज़्में लिखीं।
“मुझ से पहली सी मोहब्बत…” मोहब्बत की हदें तोड़ीं
फ़ैज़ की सबसे चर्चित नज़्म “मुझ से पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब न माँग…” केवल इश्क़ की कहानी नहीं थी। वह वर्ग-संघर्ष, युद्ध, बेरोज़गारी, स्त्री-शोषण और ज़ुल्म की तस्वीर पेश करती है। उनके शेरों में जिस्म बिकते बाज़ार भी हैं, तिलिस्मी ज़ंजीरें भी, पीप बहाती सियासत भी, और कूचा-ओ-बाज़ार में बिकती इंसानियत भी।
फ़ैज़ की शायरी फिल्मों में
फ़ैज़ की नज़्में हिंदी फिल्मों में भी जगह बना चुकी हैं। “मुझ से पहली सी मोहब्बत” को गुलज़ार और नसीरुद्दीन शाह ने अपनी प्रस्तुतियों में शामिल किया। उनके शब्दों ने परदे पर भी वही असर डाला, जो किताबों में करते थे।
फ़ैज़ सिर्फ शायर नहीं, एक आंदोलन
वह ‘प्रगतिशील लेखक संघ’ के स्तंभों में एक थे। जेल भी गए, निर्वासन भी झेला, मगर, क़लम कभी झुकी नहीं। शायरी उनके लिए इश्क़ भी थी, हथियार भी। उनकी शायरी आज भी ज़िंदा है, किताबों में, यादों में, और सोशल मीडिया के हर उस कोने में, जहां कोई इश्क़ को सियासत से, शायरी को समाज से जोड़ने की कोशिश करता है।
