नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने एअर इंडिया के अहमदाबाद विमान हादसे को लेकर एक अहम आदेश देते हुए एयरक्राफ्ट एक्सीडेंट इन्वेस्टिगेशन ब्यूरो (AAIB) को जांच रिपोर्ट तीन सप्ताह के भीतर पेश करने का निर्देश दिया है। यह आदेश 12 जून 2025 को हुए उस भयावह विमान हादसे के संदर्भ में दिया गया है, जिसमें कुल 260 लोगों की जान चली गई थी। इस दुर्घटना ने न केवल देश बल्कि पूरी दुनिया को झकझोर कर रख दिया था।
इस मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने की। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि जांच केवल औपचारिकता न हो, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मानकों और तय प्रक्रियाओं के अनुरूप की जाए। इसी क्रम में सुप्रीम कोर्ट ने एएआईबी से अब तक अपनाए गए प्रक्रियात्मक प्रोटोकॉल पर भी विस्तृत रिपोर्ट मांगी है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि जांच में किसी भी तरह की लापरवाही या चूक नहीं हुई है।
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि एएआईबी द्वारा की जा रही जांच अपने अंतिम चरण में है। उन्होंने कहा कि हादसे से जुड़े कुछ तकनीकी हिस्सों की जांच विदेशों में कराई जा रही है और संभावना है कि तीन सप्ताह के भीतर पूरी जांच रिपोर्ट तैयार कर ली जाएगी। सॉलिसिटर जनरल ने यह भी आश्वासन दिया कि जांच रिपोर्ट को सीलबंद लिफाफे में कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा, ताकि उसकी गोपनीयता और निष्पक्षता बनी रहे।
यह आदेश एनजीओ ‘सेफ्टी मैटर्स फाउंडेशन’ द्वारा दायर याचिका पर दिया गया। याचिका में मांग की गई थी कि इस भीषण विमान दुर्घटना की जांच कोर्ट की निगरानी में कराई जाए, क्योंकि मामला अत्यंत गंभीर है और इससे देश की हवाई सुरक्षा सीधे तौर पर जुड़ी हुई है। याचिकाकर्ता ने यह भी आशंका जताई थी कि केवल एएआईबी की जांच इस स्तर की दुर्घटना के लिए पर्याप्त नहीं हो सकती। कोर्ट ने फिलहाल स्पष्ट किया कि पहले एएआईबी की जांच रिपोर्ट को देखा जाएगा और उसके बाद ही यह तय किया जाएगा कि किसी समानांतर या कोर्ट-नियंत्रित जांच की आवश्यकता है या नहीं। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि एएआईबी का उद्देश्य केवल दुर्घटना के कारणों का पता लगाना है, न कि किसी व्यक्ति की मंशा या दोष तय करना।
सुनवाई के दौरान एनजीओ की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि बोइंग 787 विमानों से जुड़ी इससे पहले भी तीन बड़ी घटनाएं सामने आ चुकी हैं, लेकिन केंद्र सरकार ने अब तक इस पर कोई ठोस जवाब नहीं दिया है। भूषण ने दावा किया कि 8,000 से अधिक पायलट यह मानते हैं कि बोइंग 787 पूरी तरह सुरक्षित नहीं है और इसे अस्थायी रूप से ग्राउंड किया जाना चाहिए।
प्रशांत भूषण ने अदालत में यह भी कहा कि इतनी बड़ी दुर्घटना के बाद सिर्फ एक एजेंसी की जांच पर निर्भर रहना उचित नहीं है। उनके अनुसार, समानांतर और स्वतंत्र जांच से ही सच्चाई सामने आ सकती है और भविष्य में ऐसे हादसों को रोका जा सकता है। इस पर सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने व्यंग्यात्मक अंदाज में कहा कि भूषण को संतुष्ट करने का एकमात्र तरीका यह है कि जांच समिति की अध्यक्षता स्वयं प्रशांत भूषण को ही सौंप दी जाए। हालांकि, अदालत ने इस टिप्पणी को हल्के में लेते हुए केंद्र से यह सुनिश्चित करने को कहा कि जांच प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी और नियमों के अनुसार हो।
यह भी उल्लेखनीय है कि हादसा एअर इंडिया के बोइंग 787-8 ड्रीमलाइनर विमान, फ्लाइट AI-171 के साथ हुआ था। यह विमान अहमदाबाद से लंदन के गैटविक एयरपोर्ट के लिए उड़ान भर रहा था। विमान की कमान अनुभवी पायलट कप्तान सुमीत सभरवाल के हाथों में थी, जबकि सह-पायलट के रूप में कप्तान क्लाइव कुंडर मौजूद थे। उड़ान भरने के कुछ ही समय बाद विमान तकनीकी कारणों से दुर्घटनाग्रस्त हो गया।
इस हादसे में 241 यात्री और चालक दल के सदस्य मारे गए, जबकि जमीन पर मौजूद लोगों को मिलाकर मृतकों की कुल संख्या 260 तक पहुंच गई। मृतकों में पूर्व गुजरात मुख्यमंत्री विजय रूपाणी का नाम भी शामिल है, जिससे यह हादसा और अधिक राजनीतिक और सामाजिक रूप से संवेदनशील बन गया। मृतकों की नागरिकता की बात करें तो इस दुर्घटना में 169 भारतीय नागरिक, 52 ब्रिटिश नागरिक, 7 पुर्तगाली नागरिक, 1 कनाडाई नागरिक और 12 चालक दल के सदस्य शामिल थे। हादसे में केवल एक व्यक्ति जीवित बच पाया, जिसकी पहचान ब्रिटिश नागरिक विश्वशकुमार रमेश के रूप में हुई है। उनकी हालत अब स्थिर बताई जा रही है।
सुप्रीम कोर्ट के इस सख्त रुख के बाद अब सबकी निगाहें एएआईबी की जांच रिपोर्ट पर टिकी हैं। यह रिपोर्ट न केवल मृतकों के परिजनों के लिए न्याय की उम्मीद है, बल्कि भारत में हवाई सुरक्षा मानकों की समीक्षा और भविष्य की नीतियों के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। आने वाले तीन सप्ताह देश की एविएशन सुरक्षा के लिहाज से बेहद अहम साबित हो सकते हैं।
