कुरआन के नाजिल होने का महीना, रहमत,मग़फिरत, जहन्नुम से निजात का पैग़ाम
बरेली : मुक़द्दस रमज़ान मुबारक का महीना इस्लामी कैलेंडर का सबसे अफ़ज़ल और बरकतों वाला महीना माना जाता है। यही वह महीना है जिसमें पवित्र क़ुरआन शरीफ़ नाज़िल हुआ। क़ुरआन की सूरह अल-बक़रा (आयत 185) में साफ़ तौर पर इरशाद है कि रमज़ान वह महीना है। जिसमें क़ुरआन उतारा गया, जो इंसानों के लिए हिदायत है और हक़ व बातिल में फ़र्क़ बताने वाला है। इसी रूहानी अहमियत की वजह से मुसलमान इस महीने में रोज़ा रखते हैं, पांच वक्त की नमाज़ के साथ नफ़्ल इबादत बढ़ाते हैं और क़ुरआन की तिलावत को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाते हैं।

तीन अशरों में तक़सीम रमज़ान
इस्लामी रिवायतों के मुताबिक़ रमज़ान 29 या 30 दिनों का होता है और इसे तीन बराबर हिस्सों, अशरा में बांटा गया है। हर अशरे की अपनी अलग रूहानी अहमियत बताई गई है।
पहला अशरा रहमत का
रमज़ान का पहला हिस्सा अल्लाह की रहमत और मेहरबानी का माना जाता है। इस दौरान रोज़ेदार अल्लाह से बरकत, सुकून और आसानी की दुआ करता है। क़ुरआन में अल्लाह को रहमान और रहीम कहा गया है, यानी बेहद मेहरबान। यह पहले रमजान से 10 वें रमजान तक होता है।
दूसरा अशरा मग़फिरत का
रमज़ान का दूसरा अशरा मग़फिरत यानी गुनाहों की माफ़ी का होता है। इन दिनों में मुसलमान सच्चे दिल से तौबा करते हैं और “अस्तग़फ़िरुल्लाह” की कसरत करते हैं। हदीसों में आता है कि जो शख़्स ईमान और इख़लास के साथ रोज़ा रखता है, उसके पिछले गुनाह माफ़ कर दिए जाते हैं। यह 11 वें रमजान से 20 वें रमजान तक होता है।
तीसरा अशरा जहन्नुम से निजात का
आख़िरी अशरा जहन्नम की आग से आज़ादी का कहलाता है। यह 21 वें रोजे से आखिर (चांद रात) तक होता है। इन दस दिनों में इबादत अपने चरम पर पहुंच जाती है। मुसलमान ज़्यादा से ज़्यादा नमाज़, तिलावत और दुआ में मशगूल रहते हैं।

लैलतुल क़द्र की रात हज़ार महीनों से बेहतर
रमज़ान के आख़िरी अशरे की ताक़ रातों यानी 21, 23, 25, 27 और 29 में लैलतुल क़द्र की तलाश की जाती है। सूरह अल-क़द्र में फ़रमाया गया है कि लैलतुल क़द्र हज़ार महीनों से बेहतर है। इस रात फ़रिश्ते उतरते हैं और अल्लाह की खास रहमत नाज़िल होती है। इस्लामी रिवायतों के मुताबिक़ पैगंबर ए इस्लाम आखिरी दस रातों में इबादत को और बढ़ा देते थे, रातों को जागते और अपने घरवालों को भी इबादत के लिए जगाते थे।
एतिकाफ़ की रिवायत
आख़िरी अशरे में कई मुसलमान मस्जिदों में एतिकाफ़ बैठते हैं, यानी दुनिया से कटकर सिर्फ़ इबादत और तिलावत में मशगूल हो जाते हैं। इसे आत्मिक शुद्धि और रब से क़रीबी हासिल करने का खास ज़रिया माना जाता है।
क्या बोले मुफ़्ती अहसन मियां
दरगाह आला हजरत के सज्जादानशीन मुफ्ती अहसन मियां ने बताया कि अल्लाह ने रमज़ान को तीन अशरों में तक़सीम किया है। पहला रहमत, दूसरा मग़फिरत और तीसरा दोज़ख से निजात का। उन्होंने कहा कि आख़िरी ताक़ रातों में क़ुरआन नाज़िल हुई और एक रात की इबादत हज़ार महीनों की इबादत से अफ़ज़ल है। रमज़ान का पैग़ाम सिर्फ़ भूखा-प्यासा रहने का नाम नहीं, बल्कि अपने नफ़्स को पाक करने, रिश्तों में मोहब्बत बढ़ाने और अल्लाह से सच्चा ताल्लुक़ जोड़ने का महीना है। यह महीना इंसान को सब्र, इबादत, तौबा और इंसानियत का पैग़ाम देता है। रहमत, मग़फिरत और निजात… तीनों का मुकम्मल संगम ही रमज़ान की असली बरकत है।
