मौलाना की रेल, जेल और क्रांति से कांपते थे फिरंगी, इंतकाल की खबर सुन बोले नेहरू अब आवाज़ सुनने को तरसेंगे
लेखक
मुहम्मद साजिद
आज़ादी की लड़ाई में लाखों क्रांतिकारियों ने अपनी जान की क़ुर्बानी दी, लेकिन कुछ शख्सियतें ऐसी भी हैं। जिनकी आवाज़ आज भी सियासत और तहरीक़ात में गूंजती है। उन्हीं में से एक हैं मौलाना सैयद अताउल्लाह शाह बुख़ारी (1892–1961), जिनको लोग “डंडे वाले पीर” और “शेर-ए-हिन्द” के नाम से भी याद करते हैं।
जलियांवाला बाग़ और शाह जी की सियासी ज़िंदगी का आग़ाज़
ऐतिहासिक रिकार्ड्स बताते हैं कि 1919 के जलियांवाला बाग़ हत्याकांड ने मौलाना शाह बुख़ारी की ज़िंदगी बदल दी। उन्होंने कहा था उस हादसे ने मेरी ज़िंदगी की काया पलट दी, मैंने ठान लिया कि ब्रिटिश हुकूमत के ख़िलाफ़ जंग-ए-अज़ीम लड़नी ही है। ख़िलाफ़त कमेटी और फिर मजलिस-ए-अहरार-ए-इस्लाम के मंच से उन्होंने पूरे मुल्क को झकझोर कर रख दिया।
तीन हिस्सा रेल में, एक हिस्सा जेल में
इतिहासकार लिखते हैं कि शाह बुख़ारी का सफ़रनाम सिर्फ़ तक़रीरों का नहीं बल्कि एक जंग का था। मुल्क के कोने-कोने में रेल से सफ़र कर लोगों को आज़ादी का पैग़ाम दिया। ब्रिटिश हुकूमत के ख़िलाफ़ बाग़ी तक़रीरों की वजह से उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा। पंजाब, दिल्ली, पटना से लेकर कन्याकुमारी तक उनकी आवाज़ ने लाखों दिलों में अंग्रेज़ी साम्राज्य के खिलाफ नफ़रत भर दी।
भारत-पाक बँटवारे के खिलाफ बुलंद की आवाज़
अताउल्लाह शाह बुख़ारी ने पाकिस्तान के क़ायम होने की मुख़ालफ़त (विरोध) किया। उन्होंने कहा था “अंग्रेज़ मुल्क को बाँटकर जाएंगे, और इसकी क़ीमत हम ख़ून से अदा करेंगे।”बँटवारे के बाद उन्होंने सियासत से किनारा कर लिया। मगर, आख़िरी दम तक अंग्रेज़ों की बनाई नस्ली, और फिरकापरस्त सियासत के ख़िलाफ़ लड़ते रहे।
मौलाना का तसव्वुर-ए-हुकूमत
शाह बुख़ारी का नज़रिया बड़ा साफ़ था। वो कहते थे “हुकूमत ऐसी होनी चाहिए, जिसमें हर क़ौम सुकून से रह सके, जुल्म, चोरी, डकैती,शराबखोरी और जुए के अड्डे मिटा दिए जाएँ। यही असली जीत होगी।”
पंडित नेहरू भी उनकी तिलावत सुनने को रहते थे मौजूद
21 अगस्त 1961 को ये “सिपाही -ए-आज़ादी” दुनिया को अलविदा कह गया। पंडित नेहरू भी उनकी तिलावत सुनने के लिए खास महफ़िल में मौजूद हुए थे। आज भी मौलाना अताउल्लाह शाह बुख़ारी का नाम हिन्दुस्तान की जंग-ए-आज़ादी के सच्चे सिपाहियों में अमर है।
