हर घर तिरंगा… 79 साल पहले भी बरेली में लहराया था राष्ट्रध्वज
15 अगस्त 1947…यह वो तारीख थी, जब भारत ने सदियों की गुलामी की जंजीरें तोड़ीं। बरेली की सुबह आज़ादी का मेला बन गई थी। सुबह 5 बजे, कुतुबखाना घंटाघर के पास हज़ारों लोग तिरंगे के साथ जमा थे। आज़ादी का जश्न अपने चरम पर था। ढोल, नाच, मिठाई, गले लगाकर बधाइयाँ… लेकिन हर मुस्कान के पीछे एक कसक भी थी, वो थी बंटवारे की।
बुजुर्गों की आँखें थी नम
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आजादी की सुबह “हर तरफ खुशी थी, लेकिन जिनके परिवार बंटवारे में पाकिस्तान चले गए, उनकी आँखों में दर्द भी था।” बरेली के जेसी पालीवाल, जो अब दुनिया में नहीं हैं, लेकिन कुछ वर्ष पहले उन्होंने बताया कि आजादी के वक्त 14 साल के थे। उस दौरान बुजुर्गों के माथे का पसीना उस चिंता की निशानी था, जो आने वाले हालात का अंदाज़ा दे रहा था।
आजादी की सुबह भी ‘हर घर तिरंगा’
आजादी का अमृत महोत्सव नया नहीं है। 14 अगस्त, 1947 की रात में ही, दस्तावेज़ बताते हैं कि शहर-शहर अपील की गई है, कि हर घर पर तिरंगा लहराना है, और रात 12:01 बजे झंडावंदन करना है। बरेली ने इस आह्वान को पूरे जोश से अपनाया।
15 अगस्त की तारीख क्यों?
‘Freedom at Midnight’ में लॉरी कॉलिन्स और डोमिनिक लैपियर के अनुसार, लॉर्ड माउंटबेटन ने यह तारीख इसलिए चुनी। क्योंकि, 15 अगस्त 1945 को जापान ने मित्र राष्ट्रों के सामने आत्मसमर्पण किया था, द्वितीय विश्व युद्ध के अंत का महत्वपूर्ण दिन। उनके प्रेस सचिव कैंपबेल जॉनसन का कहना था कि माउंटबेटन इस तारीख को ‘लकी’ मानते थे। इसलिए 15 अगस्त को चुना।
बरेली की ऐतिहासिक सुबह
शहर के कुतुबखाना, अयूब खां चौराहा से गुलाबराय इंटर कॉलेज तक सिर्फ तिरंगे ही तिरंगे थे। शाहबाद और भूड़ में पाकिस्तान से आए लोगों को बसाया जा रहा था। शहर जश्न और मानवीय संवेदनाओं का संगम बन गया था। यह सुबह केवल आज़ादी की शुरुआत नहीं थी। यह इतिहास का वह पन्ना था, जिसमें खुशी और ग़म दोनों एक साथ दर्ज हुए।
