नई दिल्ली : देश में राष्ट्रीय प्रतीकों को लेकर एक बड़ा और अहम फैसला सामने आया है। केंद्र सरकार ने राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम’ को लेकर नई गाइडलाइन जारी की है और इसे लेकर सख्त नियम लागू करने की तैयारी भी कर ली है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई केंद्रीय कैबिनेट की बैठक में एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया गया है। सरकार ने राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम’ को राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ के समान दर्जा देने का फैसला किया है। इसके साथ ही ‘राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम’ में संशोधन के प्रस्ताव को भी मंजूरी दी गई है। इस फैसले के लागू होने के बाद अब ‘वंदे मातरम’ के सम्मान को लेकर वही नियम लागू होंगे, जो अभी राष्ट्रगान पर लागू हैं। यानी यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर इसके गायन में बाधा डालता है या इसका अपमान करता है, तो उसे जेल, जुर्माना या दोनों का सामना करना पड़ सकता है। कानून की धारा 3 में संशोधन कर यह प्रावधान जोड़ा जाएगा, जिसमें तीन साल तक की सजा का प्रावधान है। सरकार का यह कदम ‘वंदे मातरम’ के 150 वर्ष पूरे होने के अवसर पर उठाया गया है। यह गीत महान साहित्यकार बंकिम चंद्र चटर्जी द्वारा 1875 में लिखा गया था और बाद में उनके प्रसिद्ध उपन्यास आनंदमठ में प्रकाशित हुआ।
गाइडलाइन क्या कहती हैं?
गृह मंत्रालय द्वारा जारी नई गाइडलाइन में ‘वंदे मातरम’ के गायन और प्रस्तुति के लिए स्पष्ट प्रोटोकॉल तय किए गए हैं। इसके अनुसार, छह श्लोकों वाले पूर्ण संस्करण को, जिसकी अवधि लगभग 3 मिनट 10 सेकंड है, प्रमुख सरकारी समारोहों में बजाया या गाया जाएगा। इन समारोहों में राष्ट्रीय ध्वज फहराने के कार्यक्रम, राष्ट्रपति और राज्यपालों के आधिकारिक आगमन और प्रस्थान, तथा उनके संबोधन से पहले और बाद के अवसर शामिल हैं। यदि किसी कार्यक्रम में ‘वंदे मातरम’ और राष्ट्रगान दोनों प्रस्तुत किए जाते हैं, तो पहले ‘वंदे मातरम’ और उसके बाद राष्ट्रगान गाया जाएगा। दोनों ही स्थितियों में सभी उपस्थित लोगों के लिए सावधान मुद्रा में खड़े होना अपेक्षित होगा।
शिक्षण संस्थानों में भी जोर
सरकार ने स्कूलों, कॉलेजों और अन्य संस्थानों में ‘वंदे मातरम’ के गायन को बढ़ावा देने का भी निर्देश दिया है। इसका उद्देश्य युवाओं और आम नागरिकों में राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति सम्मान और जागरूकता बढ़ाना बताया गया है। साथ ही, यदि किसी बैंड द्वारा ‘वंदे मातरम’ प्रस्तुत किया जाता है, तो उसकी शुरुआत बिगुल या ढोल की औपचारिक ध्वनि से की जाएगी, ताकि कार्यक्रम की गरिमा बनी रहे।
सिनेमा हॉल को छूट
हालांकि, सरकार ने सिनेमा हॉल और फिल्म स्क्रीनिंग के दौरान ‘वंदे मातरम’ को लेकर कुछ छूट भी दी है। यदि यह किसी फिल्म के साउंडट्रैक का हिस्सा है, तो दर्शकों के लिए खड़ा होना अनिवार्य नहीं होगा, ताकि मनोरंजन का अनुभव बाधित न हो।
राजनीतिक और ऐतिहासिक संदर्भ
हाल के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के दौरान ‘वंदे मातरम’ एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनकर उभरा। भारतीय जनता पार्टी ने इसे राष्ट्रवाद और बंगाली अस्मिता के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया और इसके 150 वर्ष पूरे होने पर राज्यभर में कई कार्यक्रम आयोजित किए। इतिहास की बात करें तो, ‘वंदे मातरम’ को पहली बार 1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में रवींद्रनाथ टैगोर ने गाया था। इसके बाद यह गीत स्वतंत्रता संग्राम के दौरान क्रांतिकारियों का प्रेरणास्रोत और नारा बन गया।
कुल मिलाकर, केंद्र सरकार का यह फैसला ‘वंदे मातरम’ को एक नई संवैधानिक और सांस्कृतिक पहचान देने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है। अब देखना होगा कि इस निर्णय का सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर क्या असर पड़ता है।
