डॉ.तनु जैन
मनुष्य का जीवन शायद इस संसार का सबसे बड़ा रहस्य भी है, और सबसे अनमोल अवसर भी। हम जन्म लेते हैं, बड़े होते हैं।शिक्षा प्राप्त करते हैं, सपने देखते हैं, संघर्ष करते हैं, सफलता और असफलता से गुजरते हैं और फिर एक दिन यह यात्रा समाप्त हो जाती है, लेकिन इन सबके बीच एक प्रश्न ऐसा है, जो अक्सर हमारी व्यस्त जिंदगी के शोर में दब जाता है, आखिर हम जीवन जी किसलिए रहे हैं? आज का मनुष्य पहले से कहीं अधिक व्यस्त हैं। उसके पास साधन हैं, सुविधाएँ हैं, तकनीक है, जानकारी है और दुनिया से जुड़ने के अनगिनत माध्यम हैं। लेकिन विडंबना यह है कि इतनी सुविधाओं के बावजूद वह स्वयं से दूर होता जा रहा है। वह भविष्य की तैयारी में वर्तमान को खो देता है। वह कल की सफलता के लिए आज की खुशियाँ टाल देता है।वह जीवन बनाने में इतना व्यस्त हो जाता है कि कई बार जीना ही भूल जाता है।
हम अक्सर कहते हैं-अभी बहुत समय है
किसी अपने से बात करनी है, कल करेंगे। किसी से माफी मांगनी है, तो फिर कभी मांग लेंगे। कोई सपना पूरा करना है, सही समय आने पर करेंगे। किसी जरूरतमंद की मदद करनी है अगली बार करेंगे, लेकिन जीवन का सबसे बड़ा सत्य यही है कि समय हमेशा आगे बढ़ता है,हमारे इंतजार में कभी नहीं रुकता। भारतीय ज्ञान परंपरा ने जीवन की दुर्लभता और उसकी जिम्मेदारी को हजारों वर्षों पहले ही समझ लिया था।विवेकचूड़ामणि का प्रसिद्ध श्लोक कहता है-“दुर्लभं त्रयमेवैतत् देवानुग्रहहेतुकम्। मनुष्यत्वं मुमुक्षुत्वं महापुरुषसंश्रयः॥” अर्थात मनुष्य जन्म, उच्चतर सत्य को जानने की आकांक्षा और श्रेष्ठ व्यक्तित्वों का सान्निध्य
ये अत्यंत दुर्लभ हैं, और इन्हें ईश्वर की कृपा माना
यह विचार हमें एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी की ओर ले जाता है।यदि जीवन इतना दुर्लभ अवसर है, तो इसका मूल्य केवल वर्षों की संख्या से तय नहीं हो सकता।असली प्रश्न यह है कि हमने अपने जीवन के वर्षों के साथ किया क्या? क्या हमने केवल अपने लिए जिया? क्या हमारी सफलता केवल हमारे नाम तक सीमित रही? क्या हमारी शक्ति से किसी कमजोर को सहारा मिला?
क्या हमारे ज्ञान से किसी का अंधकार कम हुआ? क्या हमारी उपस्थिति ने किसी के जीवन को थोड़ा बेहतर बनाया? यही प्रश्न शायद जीवन की वास्तविक परीक्षा हैं। हम हर दिन जीवन की अस्थिरता देखते हैं, फिर भी उसे भूल जाते है। महाभारत में यक्ष और युधिष्ठिर के संवाद से जुड़ा एक अत्यंत प्रसिद्ध विचार जीवन की सबसे बड़ी विडंबना को सामने रखता है।“अहन्यहनि भूतानि गच्छन्तीह यमालयम् शेषाः स्थावरमिच्छन्ति किमाश्चर्यमतः परम्॥” भावार्थ यह है कि प्रतिदिन असंख्य प्राणियों को मृत्यु की ओर जाते देखकर भी जो लोग बचे रहते हैं, वे स्वयं को स्थायी मानकर जीते हैं। इससे बड़ा आश्चर्य क्या हो सकता है?यही जीवन का सबसे बड़ा भ्रम है, हम जानते हैं कि समय सीमित है, लेकिन जीते ऐसे हैं जैसे समय अनंत हो। हम अपने सबसे अच्छे शब्दों को रोक लेते हैं। प्रेम व्यक्त करने में देर कर देते हैं। रिश्तों को समय नहीं देते। अपने स्वास्थ्य को नजरअंदाज करते हैं। अपने सपनों को टालते रहते हैं, और फिर एक दिन महसूस करते हैं कि जिस जीवन को हम “बाद में” जीना चाहते थे, उसका बहुत बड़ा हिस्सा बीत चुका है।
जीवन का सबसे बड़ा मंत्र यही होना चाहिए, जो अच्छा है, उसे आज से शुरू कीजिए
अनुशासन केवल सफलता नहीं, जीवन के प्रति सम्मान है, अनुशासन को अक्सर लोग केवल सफलता, करियर और उपलब्धियों से जोड़कर देखते हैं। लेकिन अनुशासन इससे कहीं अधिक है। समय पर उठना। अपने शरीर का ध्यान रखना।अपने मन को नियंत्रित करना।अपने वचन का सम्मान करना। काम को ईमानदारी से करना। निरर्थक विचलनों से स्वयं को बचाना। सीखते रहना। अपने उद्देश्य के प्रति निष्ठावान रहना। ये केवल आदतें नहीं हैं। ये उस जीवन के प्रति सम्मान हैं, जो हमें मिला है। समय का सम्मान करना वास्तव में जीवन का सम्मान करना है। आज दुनिया में सबसे बड़ी समस्या समय की कमी नहीं है। समस्या यह है कि हमारा ध्यान बिखरा हुआ है। हमारे पास चौबीस घंटे हैं, लेकिन हमारा मन सैकड़ों दिशाओं में दौड़ रहा है।हम घंटों स्क्रीन के सामने बिताते हैं, लेकिन कुछ मिनट स्वयं के साथ बैठना कठिन लगता है। हम दुनिया की हर खबर जानते हैं, लेकिन अपने भीतर क्या चल रहा है, यह नहीं जानते। हम दूसरों की जिंदगी देखते रहते हैं, लेकिन अपनी जिंदगी को समझने का समय नहीं निकालते। शायद आधुनिक जीवन की सबसे बड़ी जरूरत यही है, थोड़ा रुकना और स्वयं से मिलना।
कर्म ही जीवन को अर्थ देता है
श्रीमद्भगवद्गीता का सबसे प्रसिद्ध संदेश कर्म की शक्ति को समझाता है,“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।”अर्थात हमारा अधिकार कर्म करने पर है, परिणाम को पूरी तरह नियंत्रित करने पर नहीं। यह विचार आज के समय में और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। हम अक्सर परिणामों की चिंता में इतना उलझ जाते हैं। कि काम करना ही भूल जाते हैं।सफल होंगे या नहीं? लोग क्या कहेंगे? प्रशंसा मिलेगी या आलोचना? लाभ होगा या नुकसान? लेकिन जीवन का अर्थ शायद हर परिणाम को नियंत्रित करना नहीं है। जीवन का अर्थ है, अपने हिस्से का काम पूरी ईमानदारी से करना। हम यह तय नहीं कर सकते कि दुनिया हमें कितना सम्मान देगी। लेकिन हम यह तय कर सकते हैं कि हमारा चरित्र कैसा होगा। हम यह तय नहीं कर सकते कि हर प्रयास सफल होगा। लेकिन हम यह तय कर सकते हैं कि प्रयास अधूरा नहीं छोड़ेंगे। हम यह तय नहीं कर सकते कि हर व्यक्ति हमें समझेगा। लेकिन हम यह तय कर सकते हैं कि हमारी नीयत सच्ची होगी।
यही कर्मयोग है…
जब ‘मैं’ से आगे बढ़कर ‘हम’ आता है, तब जीवन बड़ा होता है मनुष्य की उपलब्धियाँ तब तक अधूरी हैं, जब तक उनमें मानवता शामिल नहीं होती। ज्ञान मिला है तो किसी को सिखाइए। शक्ति मिली है तो किसी कमजोर का सहारा बनिए। संसाधन मिले हैं तो कुछ हिस्सा समाज के लिए रखिए। पद मिला है तो अवसर पैदा कीजिए। प्रभाव मिला है तो उसका उपयोग जिम्मेदारी के साथ कीजिए। क्योंकि जीवन की वास्तविक ऊंचाई केवल इस बात से तय नहीं होती कि हम कितने ऊपर पहुंचे। बल्कि इससे तय होती है कि हमारे ऊपर पहुंचने से कितने लोगों को ऊपर आने का रास्ता मिला।
सेवा कोई कमजोरी नहीं है
संवेदनशीलता कोई बोझ नहीं है। दूसरों के लिए कुछ करना समय की बर्बादी नहीं है। वास्तव में यही वे कार्य हैं, जो जीवन को केवल सफल नहीं बल्कि सार्थक बनाते हैं। सबसे बड़ा संघर्ष स्वयं से है।गीता कहती है- “उद्धरेदात्मनात्मानं,नात्मानमवसादयेत्। आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥”मनुष्य स्वयं अपना मित्र भी है और स्वयं अपना शत्रु भी।बहमारा जीवन किसी एक बड़े निर्णय से नहीं बनता। यह प्रतिदिन किए गए छोटे-छोटे चुनावों से बनता है। सुबह उठना या सोते रहना। पढ़ना या समय बर्बाद करना।।स्वास्थ्य का ध्यान रखना या उसे नजरअंदाज करना। सच बोलना या सुविधा के लिए समझौता करना। मदद करना या आंखें बंद कर लेना। डर में रहना या साहस के साथ आगे बढ़ना। ये छोटे निर्णय धीरे-धीरे हमारा व्यक्तित्व बनाते हैं और फिर वही व्यक्तित्व हमारी जिंदगी की दिशा तय करता है। हितोपदेश का प्रसिद्ध श्लोक हमें याद दिलाता है,“उद्यमेन हि सिद्ध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः। न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥”सिर्फ इच्छाओं से जीवन नहीं बदलता। सपनों को श्रम चाहिए। संकल्प को अनुशासन चाहिए, और सफलता को निरंतर प्रयास चाहिए।
जीवन को सिर्फ गुजारिए मत, महसूस भी कीजिए
हमारी सबसे बड़ी भूल यह है कि हम अक्सर जीवन को एक मशीन की तरह जीने लगते हैं। सुबह उठना, काम करना। कमाना,खर्च करना, थकना, सोना, और फिर वही क्रम दोहराना, लेकिन क्या यही जीवन है? जीवन केवल जिम्मेदारियों की सूची नहीं है।जीवन किसी लक्ष्य तक पहुंचने की दौड़ भर नहीं है।नजीवन केवल उपलब्धियों का संग्रह भी नहीं है। जीवन है-एक बच्चे की मुस्कान को महसूस करना।माता-पिता के साथ बैठना। किसी पुराने मित्र को याद करना। प्रकृति को देखना। किसी जरूरतमंद की मदद करना, किसी की बात ध्यान से सुनना।अपने भीतर शांति महसूस करना, और हर सुबह यह समझना कि हमें एक और दिन मिला है। एक और अवसर मिला है। एक और संभावना मिली है। हर रात खुद से चार सवाल पूछिए शायद जीवन को बेहतर बनाने के लिए बहुत बड़े सिद्धांतों की जरूरत नहीं है। हर रात सोने से पहले स्वयं से सिर्फ चार प्रश्न पूछना काफी हो सकता है।
आज मैंने क्या सीखा?
आज मैंने किसका भला किया?आज मैंने अपने समय का कितना सही उपयोग किया? आज मैं कल से बेहतर इंसान बना या नहीं? यदि हम ईमानदारी से इन प्रश्नों का उत्तर देने लगें, तो शायद हमारा जीवन धीरे-धीरे बदलने लगेगा। क्योंकि जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि प्रसिद्ध होना नहीं है। सबसे बड़ी उपलब्धि है, अच्छा इंसान बने रहना। बहुत धनवान होना जरूरी नहीं कि जीवन सफल हो। बहुत प्रसिद्ध होना जरूरी नहीं कि जीवन सार्थक हो। बहुत बड़े पद पर होना जरूरी नहीं कि जीवन महान हो, लेकिन यदि हमारे कारण किसी के जीवन में आशा आई, किसी का दर्द कम हुआ, किसी को अवसर मिला, किसी का विश्वास बचा और किसी के चेहरे पर मुस्कान आई,तो शायद हमने जीवन को सही दिशा दी।
हर सुबह ईश्वर का नया संदेश है।
अभी अवसर बाकी है..
हम अतीत नहीं बदल सकते, जो गलतियां हो चुकी हैं, उन्हें मिटा नहीं सकते, जो समय बीत गया, उसे वापस नहीं ला सकते, लेकिन आज हमारे पास है, और आज ही जीवन की सबसे बड़ी शक्ति है। हर सुबह हमें एक नया अवसर मिलता है। कल की गलतियों को सुधारने का अवसर। नई शुरुआत करने का अवसर। किसी से माफी मांगने का अवसर। किसी को माफ करने का अवसर। कुछ नया सीखने का अवसर। अपने सपनों की ओर पहला कदम बढ़ाने का अवसर। और सबसे महत्वपूर्ण, एक बेहतर इंसान बनने का अवसर। इसलिए शायद जीवन का सबसे सुंदर संदेश वही है, जो प्राचीन भारतीय चिंतन में बार-बार सुनाई देता है, “चरैवेति… चरैवेति…”चलते रहो। रुको मत। सीखते रहो। गिरो तो संभलो, गलतियां हों तो सुधारो। सफलता मिले तो विनम्र रहो। शक्ति मिले तो सेवा करो। ज्ञान मिले तो बांटो। और हर दिन स्वयं को कल से थोड़ा बेहतर बनाते रहो।क्योंकि मनुष्य होने का सबसे बड़ा सौभाग्य केवल इतना नहीं है कि हमें जीवन मिला है। सबसे बड़ा सौभाग्य यह है कि हमें हर सुबह फिर एक अवसर मिलता है, यह तय करने का कि इस अनमोल जीवन को हम कितना सुंदर, कितना उपयोगी और कितना सार्थक बनाएंगे। जीवन की लंबाई हमारे हाथ में नहीं हो सकती, लेकिन जीवन की गहराई, उसकी ईमानदारी और उसकी सार्थकता, उसके लिए हम हर दिन एक चुनाव कर सकते हैं। इसलिए जीवन को केवल गुजारिए मत…उसे समझिए, महसूस कीजिए। सुधारिए और जहाँ तक संभव हो,अपने होने से इस दुनिया को थोड़ा बेहतर बनाइए। क्योंकि जीवन ईश्वर का दिया हुआ केवल एक अवसर नहीं है, यह एक जिम्मेदारी भी है। लेख को संक्षिप्त और प्रभावशाली बनाइए दोहराव कम करके प्रवाह सुधारिए, श्लोकों की जगह सरल भाषा अपनाइए
