बरेली/इलाहाबाद: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बरेली में सितंबर माह में भड़की हिंसा और धार्मिक उकसावे से जुड़े मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने मौलाना तौकीर रज़ा के सहयोगी रेहान की जमानत अर्जी खारिज कर दी। अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि हिंसा भड़काने वाले नारे न केवल आपराधिक कृत्य हैं, बल्कि वे भारतीय संविधान, कानून व्यवस्था और देश की संप्रभुता पर सीधा हमला हैं।
किस केस में दाखिल हुई थी जमानत अर्जी?
यह आदेश आपराधिक विविध जमानत आवेदन संख्या 43604/2025 में पारित किया गया, जो थाना कोतवाली, जिला बरेली में दर्ज केस संख्या 489/2025 से संबंधित है। मामले में भारतीय न्याय संहिता की कई गंभीर धाराओं के साथ सार्वजनिक संपत्ति क्षति निवारण अधिनियम और आपराधिक विधि संशोधन अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज है।
हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी
न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल ने सुनवाई के दौरान कहा कि “गुस्ताख-ए-नबी की एक ही सजा, सर तन से जुदा” जैसे नारे समाज में भय का वातावरण बनाते हैं और खुले तौर पर कानून को नकारते हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भारत के कानून में इस तरह की किसी सजा का प्रावधान नहीं है और ऐसे नारे सीधे तौर पर हिंसा को बढ़ावा देते हैं।
कैसे भड़की थी हिंसा?
कोर्ट रिकॉर्ड के अनुसार, 26 सितंबर को जुमा नमाज के बाद बिहारीपुर क्षेत्र में भारी भीड़ एकत्र हुई थी, जबकि पूरे जिले में धारा 163 लागू थी। इसके बावजूद भीड़ ने आपत्तिजनक और उकसावे वाले नारे लगाए। पुलिस द्वारा रोकने पर हालात बिगड़ गए और हिंसा भड़क उठी। इस दौरान पुलिसकर्मियों पर हमला हुआ, लाठियां छीनी गईं, वर्दी फाड़ी गई और पत्थरबाजी की गई। सरकारी व निजी संपत्तियों को भी नुकसान पहुंचाया गया, जिसमें कई पुलिसकर्मी घायल हुए।
जमानत अर्जी क्यों हुई खारिज
रेहान की ओर से दलील दी गई कि उसे गलत तरीके से फंसाया गया है और उसका हिंसा से कोई सीधा संबंध नहीं है। हालांकि, राज्य सरकार ने जमानत का कड़ा विरोध करते हुए इसे सार्वजनिक शांति और सामाजिक सौहार्द से जुड़ा गंभीर मामला बताया। कोर्ट ने केस डायरी, आरोपों की प्रकृति और घटना के सामाजिक प्रभाव का आकलन करने के बाद माना कि आरोपी की भूमिका प्रथम दृष्टया गंभीर है। अदालत ने कहा कि गैरकानूनी सभा, हिंसा और कानून-व्यवस्था भंग होने के पर्याप्त साक्ष्य मौजूद हैं, इसलिए जमानत देने का कोई आधार नहीं बनता।
अभिव्यक्ति की आज़ादी पर कोर्ट का रुख
हाईकोर्ट ने साफ किया कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की भी एक सीमा होती है। कोई भी नारा जो कानून से ऊपर जाकर मौत की सजा का ऐलान करे, उसे अभिव्यक्ति नहीं बल्कि अपराध माना जाएगा। अदालत ने यह भी कहा कि किसी भी धर्म में हिंसा या सिर कलम करने का समर्थन नहीं मिलता।
पुलिस-प्रशासन की भूमिका पर टिप्पणी
कोर्ट ने बरेली पुलिस और प्रशासन की कार्रवाई को संतुलित और समयोचित बताया। अदालत के अनुसार अधिकारियों की तत्परता से हालात पर काबू पाया गया और स्थिति को और बिगड़ने से रोका गया।
हाईकोर्ट का स्पष्ट संदेश
अंत में हाईकोर्ट ने दो टूक कहा कि कानून को चुनौती देने वाले नारों, धार्मिक उकसावे और हिंसक भीड़ के प्रति किसी भी तरह की नरमी नहीं बरती जाएगी।
