नई दिल्ली : देश के अलग-अलग राज्यों में चल रहे मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर सुप्रीम कोर्ट में लगातार सुनवाई चल रही है। इस बीच चुनाव आयोग ने सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष अपना पक्ष रखते हुए स्पष्ट किया है कि मतदाताओं की नागरिकता की जांच केवल चुनावी उद्देश्य से की जा रही है, न कि किसी व्यक्ति को गैर-नागरिक घोषित कर देश से बाहर निकालने के लिए। यह मामला मुख्य न्यायाधीश सूर्या कांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ के समक्ष विचाराधीन है।
सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने अदालत को बताया कि विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया किसी भी तरह की सख्त या पुलिस-जांच जैसी नहीं है। उन्होंने इसे एक “लिबरल और सॉफ्ट-टच” प्रक्रिया बताया और कहा कि इसमें पुलिस की कोई भूमिका नहीं है। यह पूरी तरह चुनाव आयोग की जिम्मेदारी के तहत संचालित की जा रही है। उन्होंने बताया कि बिहार में यह प्रक्रिया पहले ही पूरी हो चुकी है और कुछ अन्य राज्यों में जारी है। इसका मुख्य उद्देश्य केवल यह सुनिश्चित करना है कि मतदाता सूची में वही लोग शामिल हों जो कानून के तहत पात्र और वैध मतदाता हैं।
चुनाव आयोग ने कोर्ट को भरोसा दिलाया कि नागरिकता की जांच केवल मतदाता पंजीकरण के लिए की जा रही है। इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति को देश से बाहर निकालना या उसकी नागरिकता पर किसी अन्य कानूनी कार्रवाई की शुरुआत करना नहीं है। आयोग ने कहा कि वर्तमान एसआईआर प्रक्रिया में पूरी सावधानी बरती जा रही है और पुराने रिकॉर्ड को पर्याप्त महत्व दिया जा रहा है। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि जिन लोगों के नाम 2002 या उससे पहले की मतदाता सूचियों में दर्ज हैं, उन्हें मजबूत प्रमाण माना जा रहा है और ऐसे मामलों में अतिरिक्त सतर्कता अपनाई जा रही है। नोटिस जारी करने से पहले पुराने मतदाता रिकॉर्ड को ध्यान में रखा जा रहा है, ताकि किसी भी वास्तविक नागरिक को अनावश्यक परेशानी न हो।
1995 के ‘लाल बाबू हुसैन’ मामले का हवाला देते हुए याचिकाकर्ताओं ने दलील दी थी कि यदि किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची में है तो उसे नागरिक माना जाना चाहिए। इस पर चुनाव आयोग की ओर से कहा गया कि उस फैसले की परिस्थितियां अलग थीं। उस समय एसआईआर पहले ही हो चुका था और जांच पुलिस द्वारा की गई थी, जबकि मौजूदा मामले में पूरी प्रक्रिया स्वयं चुनाव आयोग द्वारा की जा रही है। इसलिए उस निर्णय को सीधे तौर पर वर्तमान एसआईआर पर लागू नहीं किया जा सकता।
चुनाव आयोग ने यह भी बताया कि जून 2025 तक के सभी मतदाताओं को एन्यूमरेशन फॉर्म भेजे जा चुके हैं, ताकि किसी को भी मतदाता सूची में शामिल होने का पूरा अवसर मिल सके। आयोग का कहना है कि वोट का अधिकार केवल उम्र से जुड़ा नहीं है, बल्कि इसके लिए भारतीय नागरिक होना, कम से कम 18 वर्ष की आयु होना, कानून के तहत अयोग्य न होना और मतदाता के रूप में पंजीकरण होना जरूरी है। यह प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 326 और जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 16 में स्पष्ट रूप से दर्ज है। सुनवाई के दौरान एडीआर की ओर से प्रशांत भूषण ने सवाल उठाया कि नागरिकता तय करने का अधिकार किसके पास है। इस पर चुनाव आयोग ने साफ किया कि उसे केवल मतदाता पंजीकरण के उद्देश्य से नागरिकता की जांच करने का अधिकार है। आयोग न तो किसी को डिपोर्ट कर सकता है और न ही किसी व्यक्ति के भारत में रहने की वैधता तय कर सकता है।
मुख्य न्यायाधीश ने भी टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि कोई व्यक्ति स्वयं को भारतीय नागरिक बताकर वोट देना चाहता है, तो चुनाव आयोग को उसकी जांच करने का अधिकार है। वहीं आयोग ने राजनीतिक दलों से अपील की कि वे एसआईआर का विरोध करने के बजाय लोगों को मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने में सहयोग करें। कोर्ट ने भी कहा कि लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए मतदाता सहभागिता बढ़ाना सभी राजनीतिक दलों की सामूहिक जिम्मेदारी है।
