लखनऊ : देश के वरिष्ठ कवि, साहित्यकार और पूर्व सांसद डॉ. उदय प्रताप सिंह अपनी बेबाक और सामाजिक सरोकारों से जुड़ी कविताओं के लिए लंबे समय से पहचाने जाते हैं। उनकी नई कविता की पंक्तियां “संघर्षों से जूझते, जो साहस के साथ, डोर सफलता की सदा रहती उनके हाथ…” एक बार फिर लोगों का ध्यान खींच रही हैं। इन पंक्तियों में कवि ने संघर्ष से घबराने के बजाय साहस के साथ परिस्थितियों का सामना करने का संदेश दिया है। कविता का मूल भाव यह है कि सफलता उन लोगों का साथ देती है, जो कठिन परिस्थितियों में भी अपने लक्ष्य से पीछे नहीं हटते और संघर्ष का सामना हिम्मत के साथ करते हैं।
बेबाक कविता के लिए अलग पहचान
डॉ. उदय प्रताप सिंह की पहचान केवल एक राजनेता के तौर पर नहीं, बल्कि हिंदी और उर्दू के वरिष्ठ कवि एवं साहित्यकार के रूप में भी रही है। उनकी रचनाओं में सामाजिक सरोकार, मानवीय संवेदना, देश, लोकतंत्र, व्यवस्था और आम आदमी की चिंताएं प्रमुखता से दिखाई देती हैं। उनकी चर्चित रचनाओं में “न मेरा है न तेरा है, ये हिन्दुस्तान सबका है” विशेष रूप से लोकप्रिय रही है। इसकी पंक्ति “नहीं समझी गई ये बात तो नुकसान सबका है” देश की एकता और साझा जिम्मेदारी का संदेश देती है। इस कविता की पंक्तियां संसद की बहसों में भी उद्धृत की जा चुकी हैं। उनकी एक अन्य चर्चित पंक्ति है “कभी-कभी सोचा करता हूँ वे बेचारे छले गये हैं,जो फूलों का मौसम लाने की कोशिश में चले गये हैं।”इन रचनाओं में उदय प्रताप सिंह की कविता का वह तेवर दिखाई देता है। जिसमें वे सामाजिक और राजनीतिक सवालों को सीधे और प्रभावशाली ढंग से सामने रखते हैं।
‘हिन्दुस्तान सबका है’ भी बना चर्चित काव्य-संग्रह
डॉ. उदय प्रताप सिंह की रचनाओं पर आधारित ‘हिन्दुस्तान सबका है’ नाम से काव्य-संग्रह भी प्रकाशित हुआ है। प्रकाशक के विवरण के अनुसार यह संग्रह भारतीय ज्ञानपीठ से 2022 में प्रकाशित हुआ। इस संग्रह की रचनाओं में देश, समाज, इंसानियत और सामाजिक समरसता जैसे विषय प्रमुख हैं। यही वजह है कि उनकी कविताएं केवल साहित्यिक मंचों तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि समय -समय पर सामाजिक और राजनीतिक विमर्श का हिस्सा भी बनती रही हैं।
राजनीति में भी लंबा सफर
डॉ. उदय प्रताप सिंह ने साहित्य के साथ-साथ सक्रिय राजनीति में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।उपलब्ध जीवनी संबंधी स्रोतों के अनुसार वे 1989 से 1996 तक 9वीं और 10वीं लोकसभा के सदस्य रहे। इसके बाद 2002 से 2008 तक राज्यसभा के सदस्य रहे। वे राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग के सदस्य भी रहे और 2012 से 2017 तक उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के अध्यक्ष पद पर रहे।
दिल्ली की गद्दी सावधान…
यूपी के पूर्व सीएम स्वर्गीय मुलायम सिंह यादव के काफी करीबी थे। 1960 में करहल के जैन इंटर कॉलेज में एक कवि सम्मेलन हुआ था। कार्यक्रम में कवि दामोदर स्वरूप ‘विद्रोही’ अपनी चर्चित रचना ‘दिल्ली की गद्दी सावधान!’ सुना रहे थे। इसी दौरान पुलिस अधिकारी द्वारा कविता रोकने की कोशिश किए जाने पर वहां मौजूद युवा मुलायम सिंह यादव मंच पर पहुंच गए थे। उस समय कार्यक्रम की अध्यक्षता उदय प्रताप सिंह कर रहे थे और मुलायम सिंह यादव उनके छात्र थे। इस प्रसंग का उल्लेख कई स्रोतों में मिलता है। यही वजह है कि उदय प्रताप सिंह को समाजवादी आंदोलन के पुराने दौर और मुलायम सिंह यादव के शुरुआती राजनीतिक -सामाजिक जीवन से जोड़कर भी देखा जाता है।
संघर्ष से सफलता तक का संदेश
डॉ.उदय प्रताप सिंह की नई कविता की पंक्तियां इसी व्यापक रचनात्मक परंपरा की अगली कड़ी मानी जा सकती हैं। “संघर्षों से जूझते, जो साहस के साथ…” जैसी पंक्तियां सीधे तौर पर जीवन में आने वाली कठिनाइयों के बीच उम्मीद और हौसले को बनाए रखने की प्रेरणा देती हैं। उनकी कविता का संदेश साफ है कि मुश्किलें रास्ता रोक सकती हैं, लेकिन यदि व्यक्ति साहस और संघर्ष का साथ नहीं छोड़ता, तो सफलता की डोर अंततः उसके हाथ में आ सकती है।
