बरेली : यूपी के कानपुर में “आई लव मुहम्मद” लिखे बोर्ड लगाने को लेकर दर्ज की गई एफआईआर पर दरगाह आला हज़रत ने कड़ा विरोध जताया है। बरेली स्थित दरगाह आला हज़रत से जुड़ा प्रमुख संगठन जमात रज़ा-ए-मुस्तफ़ा ने इसे धार्मिक स्वतंत्रता और संविधान द्वारा दिए गए अधिकारों का उल्लंघन बताया। संगठन के राष्ट्रीय महासचिव फरमान हसन ख़ान (फरमान मियां) ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर कहा कि यह कार्रवाई न केवल अन्यायपूर्ण है बल्कि भारतीय संविधान के अनुच्छेदों का भी सीधा हनन है। फरमान मियां ने कहा आई लव मुहम्मद लिखना किसी भी स्थिति में अपराध नहीं है। यह व्यक्तिगत आस्था और प्रेम की अभिव्यक्ति है। अनुच्छेद 19(1)(a) हर नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है। पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद से प्रेम जताना इसी अधिकार का हिस्सा है, जिसे किसी भी कानून से रोका नहीं जा सकता।
संविधान के आर्टिकल का दिया हवाला
उन्होंने आगे स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता और अनुच्छेद 21 के तहत जीवन व व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करना राज्य का दायित्व है। किसी व्यक्ति या समुदाय की धार्मिक भावना से जुड़ी अभिव्यक्ति को अपराध मानना असंवैधानिक है।
सुप्रीम कोर्ट ने कई बार किया स्पष्ट
बयान में कहा गया कि सुप्रीम कोर्ट कई बार यह स्पष्ट कर चुका है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र की आत्मा है। मेनका गांधी बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (1978) के निर्णय का हवाला देते हुए कहा गया कि नागरिकों की स्वतंत्रता को सीमित करना संविधान के मूल ढांचे के खिलाफ है।
मुकदमों की वापसी की मांग
दरगाह आला हज़रत ने प्रशासन से मांग की है कि निर्दोष युवकों पर दर्ज मुकदमों को तुरंत वापस लिया जाए। संगठन ने कहा कि भारतीय न्याय संहिता की धाराएं तभी लागू होती हैं जब जानबूझकर किसी धर्म का अपमान किया गया हो। “आई लव मुहम्मद” लिखना किसी धर्म का अपमान नहीं है, बल्कि यह एक सकारात्मक और प्रेमपूर्ण संदेश है।
धार्मिक स्वतंत्रता सुनिश्चित करने की अपील
संगठन ने देश के सभी प्रशासनिक अधिकारियों से अपील की है कि धार्मिक स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी सुनिश्चित की जाए। उन्होंने कहा कि संविधान सभी नागरिकों को समान अधिकार देता है और दरगाह आला हज़रत हमेशा संविधान, न्याय और भाईचारे की रक्षा के लिए आवाज उठाता रहेगा।
समाज में सौहार्द की मिसाल
फरमान मियां ने कहा कि प्रेम, सम्मान और धार्मिक सहिष्णुता का संदेश फैलाना समाज में शांति और भाईचारे को बढ़ावा देता है। “आई लव मुहम्मद” लिखना धार्मिक असहमति नहीं बल्कि अपने ईमान का सकारात्मक प्रदर्शन है, जिसे किसी भी रूप में दबाया नहीं जाना चाहिए।
