हाईकोर्ट के पहले भारतीय वकील, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के संस्थापक सदस्य, हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रबल पैरोकार और राष्ट्रवादी न्यायमूर्ति बदरुद्दीन तैयबजी की आज (19 अगस्त को) को वरसी (पुण्यतिथि) है। उनका जन्म 10 अक्टूबर, 1844 को बॉम्बे (मुंबई) में हुआ था। उनके पूर्वज कैम्बे से अरब प्रवासियों के साथ आए थे। “Tyabji, Badruddin. Speeches and Writings” (1906) और The Indian National Congress: An Historical Sketch (B.N. Pandey) में उनके योगदान का विस्तृत रूप से वर्णन मिलता है। 1867 में लंदन के Middle Temple से बार में बुलाए जाने के बाद, वे बॉम्बे हाईकोर्ट में पहले भारतीय वकील बने थे।
जंग-ए-आजादी में कानून से की मदद
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1871 में फ़िरोज़ शाह मेहता और काशीनाथ तेलंग के साथ जन -राजनीतिक आंदोलन में प्रवेश किया। 1885 में कांग्रेस के संस्थापक सदस्य बने। 1887 में मद्रास में कांग्रेस के तीसरे अधिवेशन की अध्यक्षता कर उन्होंने साफ कहा-
“मुसलमानों को अपने देशवासियों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर आगे बढ़ना चाहिए। उन्हें कोई हिचक नहीं होनी चाहिए।”यह भाषण आज भी भारतीय राजनीति में सांप्रदायिक सौहार्द का मजबूत उदाहरण माना जाता है। उन्होंने कानून को हथियार बनाकर देश की आजादी में मुख्य भूमिका निभाई थी।
राजद्रोह के आरोपी तिलक को दी जमानत
उनके न्यायपालिका में साहसिक फैसले हमेशा याद किए जाते हैं। Bombay High Court के न्यायाधीश रहकर उन्होंने 1897 के Bal Gangadhar Tilak राजद्रोह केस में तिलक को जमानत पर छोड़ने का ऐतिहासिक निर्णय दिया। उनकी निष्पक्षता और धर्मनिरपेक्ष दृष्टि की उस समय खूब सराहना हुई। महिला शिक्षा, मुस्लिम समाज में आधुनिक शिक्षा, और सामाजिक-आर्थिक सुधार के लिए उन्होंने कई संस्थानों की स्थापना की। उनका मानना था कि “Education is the real key to community upliftment.”
पहले भारतीय, फिर मुस्लिम, और अंत में इंसान
उनके जीवन दर्शन में तीन बात अहम थीं। वह कहते थे कि हम पहले एक भारतीय, फिर एक मुस्लिम, और अंत में एक मानव के रूप में हैं। यही दृष्टि उन्हें अन्य नेताओं से अलग करती थी। उनका निधन 19 अगस्त, 1906 को इंग्लैंड में हुआ था। उनकी विरासत सिर्फ़ न्यायपालिका या राजनीति तक सीमित नहीं रही, बल्कि वह भारतीय राष्ट्रवाद और साम्प्रदायिक सौहार्द का स्थायी प्रतीक बन गई।
