नई दिल्ली : केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने मंगलवार को राज्यसभा में ‘वंदे मातरम’ पर चर्चा की शुरुआत की। उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में वंदे मातरम की अहम भूमिका का जिक्र करते हुए कहा कि यह गीत केवल संगीत या काव्य नहीं बल्कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान कर्तव्य और राष्ट्रभक्ति की भावना का प्रतीक था।
अमित शाह ने विपक्ष पर भी जमकर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि संसद में जब भी वंदे मातरम का गान होता है, विपक्ष के कई सदस्य सदन से बाहर चले जाते हैं, जबकि भाजपा के सभी नेता खड़े होकर इसका सम्मान करते हैं। गृह मंत्री ने कांग्रेस के 1937 के अधिवेशन का हवाला देते हुए बताया कि उस समय वंदे मातरम के आखिरी चार छंदों के इस्तेमाल को रोके जाने का प्रस्ताव रखा गया था। उन्होंने पंडित नेहरू की भूमिका पर सवाल उठाते हुए विपक्षी दलों पर भारत की सांस्कृतिक और राष्ट्रभक्ति की भावना को नजरअंदाज करने का आरोप लगाया।
शाह ने कहा, “कल कुछ सदस्यों ने लोकसभा में सवाल उठाया कि वंदे मातरम पर चर्चा की जरूरत क्या है। यह गीत हमेशा आवश्यक रहा है। जब इसे रचित किया गया, तब इसकी जरूरत थी, आजादी के समय थी, आज भी है और 2047 में जब आधुनिक भारत होगा, तब भी इसकी आवश्यकता होगी। क्योंकि वंदे मातरम में कर्तव्य और राष्ट्रभक्ति की भावना समाहित है। जिन्हें इसकी अहमियत नहीं समझ आती, उन्हें नए सिरे से सोचने की जरूरत है।”
गृह मंत्री ने वंदे मातरम की ऐतिहासिक महत्ता बताते हुए कहा कि यह गीत 150 साल पहले बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने रचा, और इसका भाव सदियों पुराना है। उन्होंने कहा कि भगवान राम ने कहा था कि माता और मातृभूमि ईश्वर से भी बड़ी होती है। इसी प्रकार मातृभूमि का महिमामंडन शंकराचार्य और आचार्य चाणक्य ने भी किया। अमित शाह ने स्पष्ट किया कि मातृभूमि से बढ़कर कुछ नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि गुलामी के अंधकारमय काल में वंदे मातरम रोशनी की तरह था, जिसने भारतीयों में स्वतंत्रता की भावना और देशभक्ति को जगाया।
