इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर स्थलों की जर्जर स्थिति को लेकर गंभीर रुख अपनाया है। एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने झांसी, वृंदावन, आगरा और लखनऊ सहित प्रदेश के कई प्रमुख स्थानों पर मौजूद धरोहरों की हालत पर चिंता जताई है और इस मामले में केंद्र और राज्य सरकार के कई विभागों को नोटिस जारी किया है।
मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेंद्र की खंडपीठ ने इस मामले में सुनवाई करते हुए संस्कृति मंत्रालय, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई), राष्ट्रीय स्मारक प्राधिकरण, पर्यटन मंत्रालय, आवास एवं शहरी कार्य मंत्रालय, उत्तर प्रदेश सरकार और प्रदेश के पुरातत्व विभाग को नोटिस भेजा है। अदालत ने सभी संबंधित पक्षों को निर्देश दिया है कि वे आठ सप्ताह के भीतर अपना जवाब दाखिल करें।
यह जनहित याचिका अधिवक्ता आकाश वशिष्ठ द्वारा दाखिल की गई थी, जिसमें दावा किया गया है कि उत्तर प्रदेश में हजारों ऐतिहासिक धरोहर स्थल और प्राचीन ढांचे उपेक्षा के कारण तेजी से जर्जर होते जा रहे हैं। याचिका में कहा गया है कि इन अमूल्य धरोहरों के संरक्षण के लिए जिम्मेदार विभाग अपनी जिम्मेदारी निभाने में विफल रहे हैं, जिसके चलते कई संरचनाएं अब खंडहर में तब्दील हो चुकी हैं।
याचिका में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, पूरे उत्तर प्रदेश में करीब 3500 पुरातात्विक धरोहर स्थल मौजूद हैं, लेकिन इनमें से अधिकांश असुरक्षित हैं। आधिकारिक रिकॉर्ड के मुताबिक, केवल 212 स्थलों को ही राज्य के पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित किया जा रहा है। यह संख्या कुल धरोहरों के मुकाबले बेहद कम है, जो संरक्षण व्यवस्था की कमजोर स्थिति को दर्शाती है। इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज यानी इनटैक के आंकड़ों का हवाला देते हुए याचिका में बताया गया है कि राज्य में कुल 5,416 धरोहर और ऐतिहासिक भवन मौजूद हैं। इनमें से केवल 412 स्थलों का ही संरक्षण किया जा रहा है। इन 412 में से 212 राज्य पुरातत्व विभाग, 154 एएसआई आगरा और 55 एएसआई लखनऊ के अधीन हैं।
इसका मतलब यह हुआ कि करीब 4,995 ऐतिहासिक और प्राचीन ढांचे ऐसे हैं, जो बिना किसी संरक्षण के जर्जर अवस्था में पड़े हुए हैं और धीरे-धीरे अपने अस्तित्व को खोने के कगार पर हैं। याचिकाकर्ता ने अदालत से मांग की है कि इन सभी धरोहरों के संरक्षण के लिए ठोस कदम उठाए जाएं और जिम्मेदार विभागों को उनकी जवाबदेही तय की जाए। याचिका में यह भी उल्लेख किया गया है कि प्राचीन स्मारक अधिनियम के तहत केंद्र और राज्य सरकार की जिम्मेदारी है कि वे इन ऐतिहासिक धरोहरों की सुरक्षा और संरक्षण सुनिश्चित करें। इसके बावजूद कई महत्वपूर्ण स्थलों पर आज तक जरूरी विरासत उपनियम लागू नहीं किए गए हैं, खासकर आगरा क्षेत्र में यह स्थिति ज्यादा चिंताजनक बताई गई है।
अदालत के इस रुख को धरोहर संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। यह मामला न केवल ऐतिहासिक विरासत की सुरक्षा से जुड़ा है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए सांस्कृतिक धरोहर को बचाने का भी सवाल है। फिलहाल, अब सभी की नजरें संबंधित विभागों की ओर हैं, जिन्हें आठ सप्ताह के भीतर अदालत में अपना पक्ष रखना होगा। यह देखना अहम होगा कि सरकार और संबंधित एजेंसियां इस मामले में क्या कदम उठाती हैं और क्या प्रदेश की धरोहरों को बचाने के लिए कोई ठोस योजना सामने आती है।
