मुंबई : महाराष्ट्र के नगर निकाय चुनावों के नतीजों ने इस बार राज्य की राजनीति में एक नई चर्चा को जन्म दे दिया है। इन चुनावों में ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन यानी एआईएमआईएम ने जिस तरह से प्रदर्शन किया, उसने न सिर्फ स्थानीय स्तर पर बल्कि प्रदेश की राजनीति में भी कई संकेत छोड़े हैं। पार्टी ने पूरे राज्य में कुल 126 सीटें जीतकर अपनी मौजूदगी का मजबूती से एहसास कराया है। खासकर छत्रपति संभाजीनगर में मिली सफलता को राजनीतिक विश्लेषक बेहद अहम मान रहे हैं, क्योंकि यह जीत केवल नगर निकाय तक सीमित नहीं मानी जा रही, बल्कि आने वाले बड़े चुनावों की दिशा का संकेत भी समझी जा रही है।
पार्टी के बेहतर प्रदर्शन के पीछे एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी की सक्रिय भूमिका को बड़ी वजह बताया जा रहा है। इस बार ओवैसी ने चुनाव प्रचार में पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा समय दिया। बड़े मंचों के साथ-साथ छोटे इलाकों में जाकर उन्होंने सीधे मतदाताओं से संवाद किया। घर-घर संपर्क अभियान के जरिए स्थानीय समस्याओं को समझा गया और उन्हीं मुद्दों को चुनावी एजेंडे का हिस्सा बनाया गया। पार्टी नेताओं का कहना है कि पिछली बार कई जगहों पर बेहद करीबी हार का सामना करना पड़ा था, जिसने कार्यकर्ताओं को इस बार और ज्यादा मेहनत करने के लिए प्रेरित किया। उसी मेहनत का असर नतीजों में साफ नजर आया।
छत्रपति संभाजीनगर में एआईएमआईएम ने 33 सीटों पर जीत दर्ज की, जो इस चुनाव की सबसे बड़ी उपलब्धियों में गिनी जा रही है। मालेगांव में पार्टी को 21 सीटें मिलीं, जबकि नांदेड़ में 14 और अमरावती में 12 सीटों पर पार्टी के उम्मीदवार विजयी रहे। धुले में 10 और सोलापुर में आठ सीटें जीतकर एआईएमआईएम ने वहां भी अपनी स्थिति मजबूत की। इसके अलावा मुंबई में आठ, नागपुर में छह, ठाणे में पांच, अकोला में तीन, अहिल्यनगर और जलना में दो-दो और चंद्रपुर में एक सीट पार्टी के खाते में गई। पार्टी का मानना है कि पिछले नगर निकाय चुनावों में मिली 80 सीटों के अनुभव से उन्हें शहरी मतदाता की सोच को बेहतर ढंग से समझने में मदद मिली, जिसका फायदा इस बार खुलकर सामने आया।
हालांकि चुनाव की शुरुआत में छत्रपति संभाजीनगर में टिकट बंटवारे को लेकर असंतोष भी देखने को मिला था। कुछ नेताओं की नाराजगी ने पार्टी के लिए चुनौती खड़ी कर दी थी, लेकिन ओवैसी की मौजूदगी और प्रभावशाली इलाकों में की गई रैलियों ने माहौल को धीरे-धीरे बदल दिया। नाराज नेताओं से व्यक्तिगत बातचीत कर लगभग 70 प्रतिशत को दोबारा पार्टी के साथ जोड़ा गया। इसके साथ ही छोटे-छोटे कार्यक्रमों के जरिए नगर निकाय से जुड़ी स्थानीय समस्याओं को प्रमुखता से उठाया गया। पार्टी ने विपक्षी दलों की आपसी खींचतान को भी चुनावी अवसर में बदला और उसका फायदा उठाते हुए मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत की। यही कारण है कि इस बार एआईएमआईएम का प्रदर्शन सिर्फ एक जीत नहीं, बल्कि बदलते राजनीतिक समीकरणों की ओर इशारा करता नजर आ रहा है।
