प्रयागराज/लखनऊ : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बरेली की 26 सितंबर 2024 की हिंसा से जुड़ी FIR को रद्द करने की मांग वाली याचिका को सख्त शब्दों में खारिज कर दिया।याची अदनान की याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने कहा कि प्रथम दृष्टया उसके खिलाफ अपराध का स्पष्ट संकेत मिलता है, ऐसे में FIR रद्द करना जांच को कमजोर करेगा और कानून-व्यवस्था पर भारी असर डालेगा। पीठ ने स्पष्ट कहा कि “गंभीर आरोपों वाली FIR को इस स्तर पर रद्द करना न्याय और जांच दोनों के लिए हानिकारक होगा। याची चाहे, तो अन्य कानूनी उपाय अपना सकता है।”
पुलिस पर तेजाब, ईंट-पत्थर और गोलियां चलाने का आरोप
बताया जाता है कि अतिरिक्त महाधिवक्ता अनूप त्रिवेदी और सहायक महाधिवक्ता पारितोष मालवीय ने अदालत को बताया कि 26 सितंबर को स्थिति बेहद भयावह थी। 200–250 लोगों की भीड़ ने पुलिस बल पर ईंट-पत्थर, तेजाब भरी बोतलें और यहां तक कि गोलियां तक दागीं। हमले में कई पुलिसकर्मी गंभीर रूप से घायल हुए। दो अधिकारियों के कपड़े तक फट गए।
हालात इतने तनावपूर्ण हो गए कि पुलिस को आत्मरक्षा में फायरिंग करनी पड़ी।
आइएमसी प्रमुख के आह्वान पर जुटी भीड़
राज्य सरकार की ओर से अदालत में बताया गया कि आइएमसी प्रमुख मौलाना तौकीर रज़ा ने इस्लामिया इंटर कॉलेज में आई लव मुहम्मद के पोस्टर के मामले में मुकदमें के बाद ज्ञापन देने का आह्वान किया था। मगर, वह नहीं पहुंचे। इसके साथ ही भीड़ इकट्ठी हुई। बीएनएस की धारा 163 के तहत लागू निषेधाज्ञा के बावजूद भीड़ मौलाना आज़ाद इंटर कॉलेज से श्यामगंज चौराहे तक पहुंची और हाथों में तख्तियां लेकर भड़काऊ नारे लगाने लगी। चेतावनी देने पर भीड़ और उग्र हो गई और पुलिस से भिड़ गई। इसके बाद एक तरफ पथराव, दूसरी तरफ जवाबी कार्रवाई का दौर चलता रहा।
तौकीर रज़ा 7 में नामजद, 3 में विवेचना के दौरान नाम आया
राज्य सरकार के अधिवक्ता ने बताया कि बरेली हिंसा से जुड़े मामलों में मौलाना तौकीर रज़ा पर 5 थानों में कुल 30 मुकदमे दर्ज, 7 मामलों में नामजद आरोपी, और 3 मामलों में जांच के दौरान नाम सामने आया। सरकार ने कहा कि यदि ऐसे गंभीर मामलों में कठोर कार्रवाई न की जाए, तो यह सार्वजनिक सुरक्षा और कानून-व्यवस्था पर गंभीर संकट ला सकता है।
हाईकोर्ट ने भजनलाल और निहारिका फैसलों का हवाला दिया
राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के दो महत्वपूर्ण निर्णयों का हवाला दिया।।इसमें State of Haryana vs. Bhajan Lal और Niharika Infrastructure Pvt. Ltd. vs. State of Maharashtra इन फैसलों में कहा गया है कि गंभीर आरोपों वाली FIR को शुरुआती चरण में रद्द करना गलत है, और यह जांच को अवरुद्ध करता है। याची पक्ष ने अंततः FIR निरस्तीकरण पर जोर नहीं दिया। इसके अदालत ने राहत देने से इनकार कर दिया और याचिका निस्तारित कर दी।
