नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को राष्ट्रपति द्वारा भेजे गए उस संवैधानिक संदर्भ पर अपना फैसला सुना दिया, जिसमें पूछा गया था कि क्या संविधानिक अदालतें राज्यपाल और राष्ट्रपति द्वारा राज्य विधानसभा से पारित विधेयकों पर मंजूरी देने के लिए कोई समय-सीमा निर्धारित कर सकती हैं। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस बी.आर. गवई, जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस ए.एस. चंदुरकर की पाँच-न्यायाधीशों वाली संविधान पीठ ने इस मामले में दस दिनों तक दलीलें सुनी थीं और 11 सितंबर को फैसला सुरक्षित रख लिया था।
अदालत ने स्पष्ट किया कि राष्ट्रपति और राज्यपाल को विधेयकों पर निर्णय देने के लिए न्यायपालिका कोई निश्चित समय सीमा नहीं तय कर सकती। पीठ ने कहा कि यह मामला संवैधानिक पदाधिकारियों के विवेक और संघीय ढांचे की गरिमा से जुड़ा है। हालांकि, कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि अनावश्यक देरी लोकतांत्रिक व्यवस्था की भावना को आहत करती है, इसलिए राष्ट्रपति और राज्यपाल से अपेक्षा है कि वे ‘उचित समय’ के भीतर निर्णय लें।
मई 2025 में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने संविधान के अनुच्छेद 143(1) के तहत सुप्रीम कोर्ट से राय मांगी थी। राष्ट्रपति ने अपने संदर्भ में कुल 14 संवैधानिक प्रश्न भेजे थे, जिनका संबंध मुख्य रूप से अनुच्छेद 200 और 201 से है, जिनमें राज्यपाल और राष्ट्रपति के विधेयकों पर अधिकार और भूमिका का उल्लेख है।
सुप्रीम कोर्ट की इस महत्वपूर्ण राय ने स्पष्ट कर दिया है कि विधायी प्रक्रिया में राष्ट्रपति और राज्यपाल की भूमिका संवैधानिक कर्तव्यों के अंतर्गत आती है, लेकिन अदालत उनके निर्णय की समय सीमा तय नहीं कर सकती।
