लेखक मुहम्मद साजिद
1857 की गूँज जब मेरठ और दिल्ली से उठी, तब उसका असर देश की दरगाहों तक पहुँचा। मुरादाबाद, बरेली से लेकर देश के हर कोने की दरगाह अंग्रेज़ी हुकूमत के खिलाफ़ विचार और विद्रोह का केंद्र बन गई थीं। उर्दू के प्रसिद्ध साहित्यकार अल्ताफ हुसैन हाली ने अपनी रचनाओं में लिखा है कि “मुरादाबाद पर अंग्रेज़ों का आतंक कुछ ज़्यादा ही था,लेकिन यहाँ के नवाबों, सूफियों और आम लोगों ने वतन से वफ़ादारी का सबूत पेश किया।”इन्हीं वफ़ादारों में एक नाम था- शाह गुलाम बोलन,जिन्होंने अंग्रेज़ों की दमनकारी सत्ता को सूफियाना इरादे और इंसानी जज़्बे से चुनौती दी।
शाह गुलाम बोलन-सूफी परंपरा से क्रांतिकारी तक
शाह गुलाम बोलन, मुरादाबाद की दरगाह हजरत शाह बुलाकी साहब के परपोते थे। दरगाह की स्थापना 17वीं शताब्दी में हजरत शाह बुलाकी साहब ने की थी,जिनका जन्म 1631 में बिजनौर ज़िले के स्योहारा में हुआ और 1727 में उनका इंतकाल (निधन) हुआ। 1857 की क्रांति के समय यह दरगाह केवल इबादतगाह नहीं थी, यह बनी थी क्रांतिकारियों की शरणस्थली। यहाँ रोज़ाना गुप्त बैठकें होतीं, देशभक्तों को खाना खिलाया जाता, और घायल योद्धाओं की सेवा की जाती।
जब सूफी बने आज़ादी के सिपाही
शाह गुलाम बोलन ने अपने घर के दरवाज़े हर उस क्रांतिकारी के लिए खोल दिए,जिसका घर अंग्रेज़ी फौज ने उजाड़ दिया था। वे अपने संसाधनों से उनके खाने-रहने का प्रबंध करते थे। इतिहासकार आर.सी. मजूमदार ने लिखा है कि 1857 के संग्राम में
“उत्तर भारत के सूफी संतों और मौलवियों ने न केवल आध्यात्मिक बल्कि प्रत्यक्ष रूप से सैनिक सहयोग भी दिया।” इसी संदर्भ में शाह गुलाम बोलन का नाम आता है। जिन्होंने अपने अनुयायियों के साथ मिलकर कई बार अंग्रेज़ी टुकड़ियों को मुरादाबाद में पीछे हटाया।
अंग्रेज़ों की मक्कारी और शाह गुलाम बोलन की गिरफ्तारी
लेकिन, अंग्रेज़ों की नीति थी, “पहले मुस्कुराओ, फिर सज़ा दो।”वे बातचीत के बहाने दरगाह पहुँचे, शाह गुलाम बोलन को धोखे से गिरफ्तार कर लिया गया। उन पर आरोप लगाया गया कि “क्रांतिकारियों को आश्रय देने और अंग्रेज़ी सरकार के खिलाफ़ विद्रोह फैलाने” का। मुकदमा औपचारिक था, सज़ा तय थी, “काला पानी”, यानी अंडमान के सेल्युलर जेल की अमानवीय कैद।
काले पानी की कैद और शहादत
सेल्युलर जेल की कठोरता का अंदाज़ा इतिहासकार वी.एन. दत्त ने अपनी पुस्तक “Freedom Struggle in U.P.” में दिया है कि “कैदियों को बैलों की जगह हल में जोता जाता था,और दिनभर धूप में कोल्हू चलाने पर मजबूर किया जाता था।”इन्हीं अमानवीय यातनाओं के बीच, 1860 में शाह गुलाम बोलन की मृत्यु (शहादत) हुई। उनकी याद आज भी मुरादाबाद के चक्कर की मिलक स्थित दरगाह में ज़िंदा है, जहाँ आज भी लोग उर्स के साथ-साथ 15 अगस्त और 26 जनवरी पर उनके बलिदान को याद करते हैं।
दरगाहें-आज़ादी की गुप्त चौकियाँ
दरगाह हजरत शाह मुकम्मल साहब, दरगाह हजरत शाह बुलाकी साहब, और दरगाह हाफिज साहब तीनों स्थान मुरादाबाद में आज़ादी की गुप्त चौकियों के रूप में काम करते थे। यही हाल बरेली की नौमहला मस्जिद का था। सज्जादानशीन शिब्ली मियाँ बताते थे कि “हमारे बुज़ुर्गों ने सिर्फ़ इबादत नहीं की,उन्होंने इंकलाब की तैयारी की। यहाँ क्रांतिकारी बैठते, योजनाएँ बनाते, और अंग्रेज़ों को चुनौती देते थे।”
नवाब असद अली खाँ, और अब्बास अली खाँ की कुर्बानी
इसी खानदान के नवाब असद अली खाँ को फाँसी, और उनके बेटे नवाब अब्बास अली खाँ को भी काला पानी की सज़ा हुई। जहाँ उन्होंने देश की आज़ादी के लिए प्राण न्योछावर किए। यह वही दौर था, जब धर्म नहीं, बल्कि वतन सबकी पहचान था। हिंदू -मुसलमान कंधे से कंधा मिलाकर अंग्रेज़ी राज के खिलाफ़ खड़े थे।
इतिहास की परतों में छिपा नाम
आज जब हम स्वाधीनता संग्राम की चर्चा करते हैं,तो दिल्ली, लखनऊ और मेरठ के नाम आगे आते हैं।
लेकिन मुरादाबाद के शाह गुलाम बोलन जैसे नाम इतिहास के पन्नों में दब गए। उनकी कहानी हमें याद दिलाती है कि आज़ादी केवल तलवार से नहीं, बल्कि सूफियाना दिलों से भी जीती गई थी।
