योगी सरकार से धर्मांतरण कानून में फँसे लोगों के लिए मुआवजे के साथ न्याय की मांग!
लखनऊ : सुप्रीम कोर्ट द्वारा उत्तर प्रदेश अनैच्छिक धर्मांतरण निषेध अधिनियम, 2021 पर उठाए गए सवालों के बाद इस कानून को तत्काल रद्द करने और इसमें फँसे लोगों को मुआवजा देने की मांग शाहनवाज़ आलम ने की। ये बातें उन्होंने अपनी साप्ताहिक “स्पीक अप” कार्यक्रम की 118वीं कड़ी में कही। सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में उत्तर प्रदेश के ईसाई वर्ग पर दर्ज धर्मांतरण के आरोपों में दर्ज एफआईआर को रद्द किया था। शाहनवाज़ आलम ने कहा कि न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा के उस बयान से स्पष्ट हो गया है कि यह कानून “सरकारी मशीनरी को धर्मांतरण की प्रक्रिया में दखल देने” के लिए बनाया गया था।
धर्म परिवर्तन वाला व्यक्ति घोषणा करे
उन्होंने कहा कि कानून की इस अनिवार्यता कि धर्म परिवर्तन करने वाला व्यक्ति अपने धर्म की घोषणा करे, निजता के अधिकार के प्रतिकूल है क्योंकि धर्म व्यक्तिगत मामला है।आलम ने कहा कि न्यायपालिका सिर्फ कानून की वैधता देखने वाली एजेंसी नहीं, बल्कि गलत कानूनों को रद्द करने वाली संस्था भी है। उन्होंने बताया कि उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट से कहा जाना कि अनुच्छेद 32 के तहत एफआईआर रद्द नहीं कर सकते, सुप्रीम कोर्ट को धमकी देने के समान है। अनुच्छेद 32 को संविधान का “हृदय” और डॉ. भीमराव आंबेडकर द्वारा “संविधान का सबसे महत्वपूर्ण प्रावधान” बताया गया था। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने ‘धर्मनिरपेक्षता संविधान के मूल ढांचे का अभिन्न अंग है’ जैसे वाक्य लिखे हैं, इसलिए उन जजों के लिए सबक है जिन्होंने इसे कलंक बताते हैं।
निर्णय पर उठाया सवाल
आलम ने यह भी कहा कि पूर्व मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ की स्वीकारोक्ति कि उन्होंने बाबरी मस्जिद राम जन्मभूमि केस में “भगवान से पूछकर निर्णय” लिया था। समीक्षा की मांग को तार्किक बनाती है। उन्होंने कहा कि 1985 के जजेज़ एक्ट को तकनीकी ढाल के रूप में इस्तेमाल कर गलत फैसलों का बचाव नहीं किया जाना चाहिए।
सामाजिक-राजनीतिक पहलू
लंबे समय से धर्मांतरण विरोधी कानूनों को मानवाधिकार एवं मौलिक अधिकारों की दृष्टि से संवैधानिक चुनौतियाँ झेलनी पड़ी हैं। शाहनवाज़ आलम के सुझाव से एक व्यापक बहस छिड़ सकती है। क्या ऐसा कानून जो निजता व धर्मस्वातंत्र्य पर सवाल उठाता हो, वह लोकतंत्र के लिए सुरक्षित है?
