“कविता में सवाल भी है, शिकवा भी” ग़ज़ल ने छुआ देश का ज़मीर
लखनऊ : राजनीति, समाज और इंसानियत पर एक साथ चोट करती हुई ग़ज़ल ने लोगों के दिलों में गूंज पैदा कर दी है। पूर्व राज्यसभा सदस्य और वरिष्ठ कवि प्रोफेसर उदय प्रताप सिंह की नई रचना-“मोहब्बत करने वालों से मोहब्बत क्यों नहीं करते…” सोशल मीडिया और साहित्यिक मंचों पर तेजी से वायरल हो रही है। इस ग़ज़ल में कवि ने मोहब्बत, इंसानियत, राजनीति और धार्मिक एकता पर बेबाकी से सवाल उठाए हैं, सवाल जो आज के भारत के दिल में उतर जाते हैं।
कविता से मोहब्बत, इंसाफ और इंसानियत का संदेश
प्रो. उदय प्रताप सिंह की यह रचना सिर्फ़ एक कविता नहीं, बल्कि आधुनिक भारत के हालात पर एक गहरी टिप्पणी है। उन्होंने समाज से पूछा है कि हम “बुज़ुर्गों के उसूलों की हिफ़ाज़त” क्यों नहीं करते, “वतन के नाम मोहब्बत की विरासत” क्यों नहीं बचा पाते। उनकी ग़ज़ल की पंक्तियाँ आज के सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्य पर सटीक बैठती हैं। “अमीरों की खुशामद करते रहते हैं सियासतदां, जो मुफलिस वोट देते उनकी खिदमत क्यों नहीं करते।”यह शेर उन राजनीतिक असमानताओं और उपेक्षित वर्ग के दर्द को उजागर करता है, जो आज भी समाज के निचले तबके को झेलना पड़ता है।
धर्म और एकता पर गूंजता संदेश
ग़ज़ल का दूसरा पहलू धार्मिक सौहार्द और एकता की अपील करता है-“नमाज़ और आरती के फासले सब खत्म हो जाएं,वतन के नाम कविता की विरासत क्यों नहीं करते।”यह शेर मौजूदा माहौल में सद्भाव और मेलजोल का पैग़ाम देता है, जहां कवि चाहते हैं कि धर्म की सीमाएं नहीं, बल्कि इंसानियत के रिश्ते मजबूत हों।
राजनीति पर तंज और सियासत की सच्चाई
प्रो. सिंह की कलम सत्ता और राजनीति के दोहरे चरित्र पर भी करारा वार करती है। “हवस की इंतहा लेकिन लियाकत है शिफर जिनकी,वो मन में सोचते होंगे, सियासत क्यों नहीं करते।”यह पंक्ति आज की राजनीति में नीतियों से ज़्यादा लालच और अवसरवाद के बढ़ते चलन को दर्शाती है।
कवि की दृष्टि- जो जुल्म सहता है, वही असली बहादुर है
ग़ज़ल का चौथा शेर शायद पूरी कविता का आत्मा है- “अमूमन ज़ुल्म करने वाले खुद डरपोक होते हैं,
पैदा हम भी उनके दिल में दहशत क्यों नहीं करते।”यह संदेश सिर्फ सत्ता से नहीं, बल्कि हर उस व्यवस्था से है जो अन्याय पर चुप है। कवि लोगों से अपील करते हैं कि अन्याय का प्रतिकार करें, डर को दिलों से मिटाएं। गरीबी और बेकारी पर समाज से सवाल किए हैं।“गरीबी, भुखमरी, बेकारी, महंगाई के मारों पर, मिलकर ऊपर वाले सब इनायत क्यों नहीं करते।”यह शेर आम आदमी की आवाज़ है- देश में बढ़ती महंगाई, बेरोज़गारी और असमानता के बीच कवि का सवाल आज हर नागरिक के मन में गूंजता है।
प्रो. उदय प्रताप सिंह-राजनीति से कविता तक का सफर
प्रोफेसर उदय प्रताप सिंह सिर्फ कवि नहीं, बल्कि समाज और राजनीति के गहरे पर्यवेक्षक भी हैं। वे राज्यसभा के सदस्य रह चुके हैं और भारतीय साहित्य में उनका योगदान अद्वितीय है। उनकी कविताएं अक्सर राजनीति की आत्मा में इंसानियत खोजती हैं, और यही वजह है कि वे आज भी जनता के कवि कहलाते हैं।
सोशल मीडिया पर गूंज-“यह ग़ज़ल हमारे समय का आईना है”
कई साहित्यकारों, पत्रकारों और युवाओं ने इस ग़ज़ल को साझा करते हुए लिखा- “यह कविता नहीं, समाज की आत्मा की पुकार है।”ट्विटर और फेसबुक पर #UdayPratapSingh और #MohabbatKyunNahiKarte जैसे हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं। अंतिम पंक्ति- उम्मीद और सवाल दोनों हैं। यह ग़ज़ल किसी एक समुदाय, वर्ग या विचार की नहीं, यह पूरे भारत की आत्मा का प्रतिबिंब है। जहां कवि हर नागरिक से पूछता है, “मोहब्बत करने वालों से मोहब्बत क्यों नहीं करते?”
