सोचिए… 72 साल की एक बूढ़ी औरत, हाथ में तिरंगा लिए, सीना गोलियों के सामने करके आगे बढ़ रही है। हर गोली के साथ उसके होंठों से सिर्फ़ एक आवाज़ गूंज रही है- “वंदे मातरम… भारत माता की जय!” यही है असली क्रांति… यही है असली बलिदान। यह थीं मातंगिनी हाजरा, जो सिर्फ़ एक नाम नहीं, बल्कि हिम्मत, कुर्बानी और आज़ादी का दूसरा नाम हैं। आज ज़रूरत है कि हम इस भूली-बिसरी वीरांगना को वही मुक़ाम दें, जिसकी वो हक़दार हैं।” इसी मुहिम को शुरू किया है”The Justice HINDI” ने हर दिन “एक गुमनाम नायक”, यह नायक देश के लिए गर्व है, जिनको जानना हम, आप और हर हिन्दुस्तानी को जानना चाहिए।
गुमनाम नायकों को नहीं मिली पहचान
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भारत की आज़ादी की जंग में कई नाम इतिहास की किताबों में चमकते रहे,- गांधी, नेहरू, सुभाष… लेकिन कुछ ऐसे नाम भी हैं, जिन्हें उनकी असली पहचान कभी नहीं मिल पाई। उन्हीं में से एक थीं- मातंगिनी हाजरा, जिन्हें लोग प्यार से “गांधी बूढ़ी” कहते थे।
गरीबी के कारण स्कूल से रहीं महरूम
मातंगिनी हाजरा का जन्म 19 अक्टूबर 1870 को मिदनापुर (वर्तमान पश्चिम बंगाल) के होगला गांव में हुआ। गरीबी इतनी थी कि पढ़ाई का सपना पूरा न हो सका। महज़ 12 साल की उम्र में 62 वर्षीय विधुर त्रिलोचन हाजरा से उनकी शादी कर दी गई। जिसके चलते जल्दी ही विधवा हो जाने के बाद ज़िंदगी ने उन्हें अकेलेपन और संघर्ष के हवाले कर दिया।
62 साल की उम्र में बनीं क्रांतिकारी
लोग सोचते हैं कि बुढ़ापे में लोग आराम करते हैं, लेकिन मातंगिनी ने 62 साल की उम्र में असहयोग आंदोलन और सविनय अवज्ञा आंदोलन में क़दम रखा। उन्होंने नमक कानून तोड़ा, कई बार जेल गईं और अंग्रेज़ों के खिलाफ काला झंडा लेकर प्रदर्शन किए। जेल से बाहर आने के बाद वह खादी पहनने लगीं और लोगों ने उन्हें कहना शुरू किया – “गांधी बूढ़ी”।
ब्रिटिश हुकूमत की पुलिस ने बरसाई गोलियां
1942 का साल था। गांधीजी ने “भारत छोड़ो आंदोलन” का नारा दिया – “करो या मरो”। मातंगिनी ने तामलुक (मिदनापुर) में 6,000 लोगों के जुलूस का नेतृत्व किया। हाथ में तिरंगा लेकर जब वो पुलिस स्टेशन की तरफ़ बढ़ीं, तो अंग्रेज़ी पुलिस ने गोलियां बरसा दीं। पहली गोली उनके दाहिने हाथ पर लगी, पर झंडा नहीं छोड़ा। दूसरी गोली बाएं हाथ पर- फिर भी झंडा थामे रहीं। तीसरी गोली सीधी माथे पर,और वो ज़मीन पर गिरीं, मगर तिरंगा उनके सीने पर था। उनके होंठों से आख़िरी शब्द निकले – “वंदे मातरम… भारत माता की जय!”
बूढ़ी गांधी की मौत से पनपा आक्रोश
उनकी शहादत ने तामलुक की जनता को इतना आक्रोशित कर दिया कि उन्होंने सरकारी दफ़्तरों पर कब्ज़ा कर “Parallel Government” बना दी। इतिहासकार लिखते हैं कि “मातंगिनी का सम्मान उस दौर में गांधीजी से कम नहीं था।” आज उनके नाम पर मेदिनीपुर में “शहीद मातंगिनी हाजरा महिला महाविद्यालय” है, ताकि आने वाली पीढ़ियां उनकी विरासत से प्रेरणा ले सकें।
