मुंबई/लखनऊ : सितम्बर, 2008 के मालेगांव विस्फोट मामले में NIA की विशेष अदालत ने सभी सातों आरोपियों को बरी कर दिया। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष की जांच में गंभीर खामियाँ थीं और ठोस सबूतों के अभाव में आरोपियों को संदेह का लाभ दिया गया। इस फैसले को लेकर पीड़ित पक्ष ने हाईकोर्ट में चुनौती देने की बात कही है।
जाने फैसले के मुख्य बिंदु
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कोर्ट ने फैसले में कहा कि “आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता।”साक्ष्य अपर्याप्त हैं। बम, मोटरसाइकिल और विस्फोटकों की प्रमाणिकता साबित नहीं हुई। जिसके चलते UAPA लागू नहीं होगा। बिना विधिवत मंजूरी के आदेश जारी किए गए। पंचनामा और जांच त्रुटिपूर्ण बताई गई, न तो विस्फोट स्थल का स्केच था, न ही सही सैंपल कलेक्शन। इसके साथ ही 95 घायल, 101 नहीं है। मेडिकल दस्तावेजों में विसंगति पाई गई।
जानें मालेगांव विस्फोट मामला?
29 सितंबर, 2008 को मालेगांव, महाराष्ट्र की एक मस्जिद के पास खड़ी मोटरसाइकिल में विस्फोट हुआ था। इसमें 6 की मौत और 100 से अधिक लोग घायल हुए। जांच के बाद साध्वी प्रज्ञा, कर्नल पुरोहित सहित सात को आरोपी बनाया गया था। इन पर UAPA, IPC और आर्म्स एक्ट के तहत आरोप थे। मगर, अदालत ने कोई विश्वसनीय वैज्ञानिक सबूत नहीं मिलने, फॉरेंसिक रिपोर्ट असंगत, फिंगरप्रिंट, मोबाइल डाटा, घटनास्थल स्केच गायब, और मोटरसाइकिल का चेसिस नंबर अस्पष्ट था
पीड़ित पक्ष के वकील शाहिद नदीम का बयान
अधिवक्ता शाहिद नदीम ने फैसले के बाद मीडिया से कहा कि “कोर्ट ने माना कि विस्फोट हुआ, लेकिन आरोपियों को बरी किया गया। हम हाईकोर्ट में अपील करेंगे।”
पूर्व सांसद साध्वी प्रज्ञा का बयान
पूर्व सांसद ने कहा कि”भगवा को बदनाम करने की साजिश रची गई थी। आज सत्य की जीत हुई।” लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित ने कहा “मुझे फिर देश सेवा का अवसर मिला। दोष संगठन का नहीं, उसमें बैठे कुछ लोगों का है।”
