पुण्यतिथि विशेष
फूलन देवी… एक नाम, जो चंबल के बीहड़ों से संसद तक गूंजा। 25 जुलाई 2001 को दिल्ली में दिनदहाड़े हत्या कर दी गई। उनकी आज पुण्यतिथि है, लेकिन मदन लाल कश्यप कहते हैं उनके सवाल आज भी हवा में तैरता है। क्या, जुल्म के खिलाफ खड़े होने पर ही इनसाफ मिलेगा। दलित बेटियों को इंसाफ़ सिर्फ मरने के बाद ही मिलेगा? यूपी के जालौन जिले के गोरहा का पुरवा में जन्मीं फूलन देवी का जीवन एक प्रतीक बन गया। सिर्फ 17 की उम्र में बलात्कार,फिर डकैत बनीं, 1981 में बेहमई गांव में 22 ठाकुरों की हत्या का आरोप,14 साल की जेल,फिर समाजवादी पार्टी से सांसद, और अंत में 2001 में हत्या। उनकी ज़िंदगी में हर मोड़ पर सत्ता, जाति और बदले का ऐसा खेल चला। जिसने उन्हें नायक और खलनायक दोनों बना दिया।
अब मूर्ति है, लेकिन मुद्दे अब भी वही
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https://youtu.be/tbtixi3Gt2c?si=CKUtOpLR2n4g6PsN
आज फूलन देवी के घर पर एकलव्य सेना द्वारा लगाई गई उनकी प्रतिमा है। यह प्रतिमा साड़ी पहने, हाथ जोड़े खड़ी महिला की है,पर जो उन्हें जानते हैं, वो कहते हैं “उस प्रतिमा में आज भी एक बारूद भरा हुआ है, जो हर अन्याय पर फट सकता है।”
बीहड़ में अब सड़क है, मगर सिस्टम अब भी ऊबड़-खाबड़
आज चंबल के बीहड़ पक्की सड़कों से जुड़ गए हैं,लेकिन जाति, पितृसत्ता और राजनीतिक सत्ता के बीहड़ अब भी ज़िंदा हैं। फूलन देवी की बंदूक अब नहीं है, लेकिन उनके सवाल अब भी धधक रहे हैं। 1981 के बेहमई कांड का फैसला आज तक नहीं आया। गवाह मर चुके, केस की डायरी गुम है। न्याय अब धुंधला है, वैसा ही जैसे चंबल के धूलभरे रास्ते।
