ब्रिटिश हुकूमत ने जब देखा कि अशफाक उल्ला खां एक निर्भीक क्रांतिकारी हैं, तो उन्हें डरा नहीं सके। उन्होंने उन्हें तोड़ने की साजिश रची। ब्रिटिश अधिकारियों ने कहा कि “हिंदुस्तान आज़ाद हो भी गया, तो हिंदुओं का राज होगा, मुसलमानों को कुछ नहीं मिलेगा।”मगर अशफाक ने जवाब दिया कि “तुम लोग हमें बाँट नहीं सकते। आज़ादी ज़रूर आएगी, और हिंदू-मुस्लिम साथ लाएंगे।”
काकोरी कांड से हिल गया ब्रिटिश तख़्त
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9 अगस्त 1925 को बरेली से लखनऊ के बीच काकोरी स्टेशन पर जो हुआ। वह सिर्फ ट्रेन लूट नहीं थी। वह ब्रिटिश अर्थव्यवस्था पर सीधा हमला था। राम प्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में अशफाक और अन्य क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों की आँखों में आँख डालकर लूट को अंजाम दिया।
जब अपनों ने की गद्दारी
काकोरी कांड के बाद अशफाक लखनऊ से बनारस और फिर दिल्ली पहुँचे, लेकिन जहां दोस्ती होनी चाहिए थी। वहां गद्दारी मिली। उनके ही एक जानने वाले ने उन्हें इनाम के लालच में पकड़वा दिया।
फांसी से पहले आखिरी बयान
“सरकार चाहे मुझ पर कितने ही जुल्म ढाए। मगर, मैं अपने साथियों के ख़िलाफ़ कभी गवाही नहीं दूंगा।” यह शब्द अशफाक ने कोर्ट में कहे और वही उनकी आखिरी गवाही बनी।
शायरी और क्रांति दोनों में माहिर
अशफाक उल्ला खां केवल क्रांतिकारी नहीं थे। वो एक बेहतरीन शायर भी थे। ‘हसरत’ तख़ल्लुस से उन्होंने इंकलाबी शायरी की। रामप्रसाद बिस्मिल से दोस्ती ने उन्हें इंकलाबी बना दिया और बरेली, शाहजहांपुर की मिट्टी ने उन्हें बलिदानी।
अंग्रेजों से बोले, पहले हिंदुस्तानी, फिर कुछ और…
अशफाक उल्ला खां ने फांसी से पहले ब्रिटिश अफसरों से कहा कि तुम सोचते हो हम मुसलमान हैं, हमें हिंदुओं से अलग कर दोगे? नहीं जनाब! हम पहले हिंदुस्तानी हैं, फिर कुछ और!” उन पर लेखक बिपिन चंद्र ने “भारत का स्वतंत्रता संग्राम” में लिखा है कि “अशफाक उल्ला जैसे युवाओं ने धर्म की दीवारें गिरा दीं, तो वहीं प्रोफेसर मुजफ्फर हुसैन की “हुतात्मा अशफाक उल्ला” में अशफाक उल्ला खां की अंग्रेजों को दी गई चेतावनी के बारे में विस्तार से बताया है। उन्होंने लिखा कि “उनकी शहादत हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल थी।”
फैजाबाद जेल में दी फांसी
अशफाक उल्ला का जन्म 22 अक्टूबर 1900 को शाहजहांपुर में हुआ था। मगर, उनकी मृत्यु 19 दिसंबर 1927 को फैजाबाद जेल में फांसी से हुई है। उनको काकोरी कांड में आरोपी बनाया गया। उनके दोस्त राम प्रसाद बिस्मिल, तख़ल्लुस हसरत थे। यह शाहजहांपुर की मिट्टी से निकले पहले क्रांतिकारी शायर-योद्धा थे।
