लेखक
मुहम्मद साजिद
मारो फिरंगी को, ये नारा न केवल भारत की आज़ादी का प्रतीक बना, बल्कि एक ऐसे क्रांतिकारी की गूंज भी बना। जिसने अपनी जान की परवाह किए बिना अंग्रेजी हुकूमत को सीधी चुनौती दी। वे थे मंगल पांडे, भारत की आज़ादी की पहली लड़ाई के अग्रदूत थे। उन्होंने ‘अंग्रेजों के खिलाफ 1857 की क्रांति का पहला बगावत’ का बिगुल बजाया था।
कारतूस बना विद्रोह की चिंगारी
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यूपी के बलिया जिले के नगवा गांव में 19 जुलाई 1827 को मंगल पांडे का जन्म हुआ था। मगर, उनकी मृत्यु 8 अप्रैल, 1857 को पश्चिम बंगाल के बैरकपुर में हुई। वह ब्रिटिश हुकूमत की 34वीं बंगाल नेटिव इन्फैंट्री के सिपाही थे। मगर, ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा सैनिकों को दी जा रही नई ‘एनफील्ड पी-53 राइफल’ की कारतूसों में गाय और सूअर की चर्बी के उपयोग ने धार्मिक आस्था को ठेस पहुंचाई। हिंदू और मुस्लिम दोनों सैनिकों में असंतोष फैल गया। मंगल पांडे ने इसे स्वीकारने से इनकार कर दिया और यहीं से क्रांति की पहली चिंगारी फूटी।
29 मार्च 1857 को बैरकपुर छावनी में पहला विद्रोह
मंगल पांडे ने अंग्रेज अफसर मेजर ह्यूसन और लेफ्टिनेंट बॉब पर हमला कर उन्हें मार डाला। उन्होंने अपने साथियों से लड़ाई में शामिल होने को कहा, लेकिन जब किसी ने साथ नहीं दिया, तो खुद पर गोली चला ली। घायल मंगल को गिरफ्तार कर लिया गया।
“जिंदा नहीं पकड़ा जाऊंगा”, वीरता की मिसाल
मंगल पांडे ने पहले ही तय कर लिया था कि वे अंग्रेजों के हाथ जिंदा नहीं आएंगे, लेकिन किस्मत ने उन्हें केवल घायल किया। ब्रिटिश अफसरों ने उन्हें 6 अप्रैल को कोर्ट मार्शल में पेश किया और फांसी की सजा सुनाई गई।
जल्लादों ने झुकाई गर्दन, फांसी से किया इनकार
इतिहासकार रुद्रांशु मुखर्जी (‘Dateline 1857’) के मुताबिक, फांसी देने आए दो जल्लादों ने मंगल पांडे की वीरता देखकर उन्हें फांसी देने से इनकार कर दिया। अंततः 8 अप्रैल 1857 को अंग्रेजों ने कलकत्ता से जल्लाद बुलाकर उन्हें फांसी दे दी। रुद्रांशु मुखर्जी की किताब में लिखा है कि”1857 की क्रांति की नींव मंगल पांडे ने रखी” तो वहीं लेखक सुभाष कश्यप की किताब में “मंगल पांडे ने धर्म और देशभक्ति दोनों की रक्षा के लिए बलिदान दिया।”की बात लिखी है। 1984 में भारत सरकार ने मंगल पांडे की शहादत को यादकर डाक टिकट जारी किया। 2005 में आमिर खान की फिल्म ‘The Rising: Ballad of Mangal Pandey’ ने उन्हें लोकप्रिय संस्कृति में फिर जीवित किया। बैरकपुर पार्क को अब ‘शहीद मंगल पांडे उद्यान’ के नाम से जाना जाता है।
आज भी गूंजता है, ‘मारो फिरंगी को’
1857 का विद्रोह केवल एक सिपाही का विद्रोह नहीं था। यह भारत की आज़ादी की पहली चिंगारी थी। मंगल पांडे ने जो बिगुल बजाया। उसने देश के कोने-कोने में स्वतंत्रता की चेतना फैला दी।
