लेखक: संजीव मेहरोत्रा, महामंत्री, बरेली ट्रेड यूनियंस फेडरेशन
भारत में बैंक राष्ट्रीयकरण को 56 साल पूरे हो चुके हैं। 1969 में जब तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने 14 बड़े निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया था, तो देश में इसे ‘आर्थिक आज़ादी की दूसरी लड़ाई’ कहा गया। उद्देश्य साफ था, बैंकिंग को कुछ अमीर घरानों के हाथ से निकालकर आम जनता, किसानों, मज़दूरों और छोटे कारोबारियों तक पहुंचाना। लेकिन आज जब देश उदारीकरण और निजीकरण की गाड़ी पर सवार है, तो सवाल फिर वही खड़े हो रहे हैं। बैंक किसके लिए हैं? जनता के लिए या कॉरपोरेट्स के लिए?
राष्ट्रीयकरण जनहित से जुड़ा एक ऐतिहासिक फैसला
बैंकों को राष्ट्रीयकरण करना एक ऐतिहासिक फैसला था। 1969 में 14 बैंक राष्ट्रीयकृत, फिर 1980 में 6 और, शाखाएं 8,200 से बढ़कर आज 1.4 लाख से ज्यादा हैं। ग्रामीण शाखाएं 1,800 से बढ़कर 55,000, कुल जमा राशि 5,000 करोड़ से बढ़कर 205 लाख करोड़,प्राथमिकता क्षेत्र ऋण जो 1969 में लगभग शून्य था, आज 50 लाख करोड़ से ज्यादा, प्रति शाखा जनसंख्या 65,000 से घटकर 9,000, यह बदलाव केवल आर्थिक नहीं था। यह सामाजिक क्रांति थी। इससे हरित क्रांति, दुग्ध क्रांति, और लघु उद्योगों को मजबूती मिली।
लेकिन अब क्या हो रहा है?
1991 के बाद लागू हुई नई आर्थिक नीतियों ने इस प्रक्रिया को उल्टा मोड़ देना शुरू किया। स्टेट बैंक के सहयोगी बैंकों का विलय। फिर अन्य बड़े बैंकों का मर्जर किया गया। आज सिर्फ 12 राष्ट्रीयकृत बैंक बचे हैं। निजीकरण की लहर, सरकारी हिस्सेदारी में कमी। बैंकिंग सेक्टर को फिर से कॉरपोरेट के हवाले किया जा रहा है। विजय माल्या 9,000 करोड़ लेकर भागा। नीरव मोदी और मेहुल चौकसी 13,000 करोड़ लेकर फरार हो गए। बैंक कर्मचारियों को पेंशन अपडेट तक नहीं मिल रही। नई भर्तियाँ बंद, काम बढ़ता जा रहा है
आज की लड़ाई : बैंक बचाओ, लोकतंत्र बचाओ
56 साल पहले की लड़ाई यह थी कि बैंकिंग सेवा जनता के लिए हो, आज की लड़ाई है कि यह सेवा जनता के हाथ में बनी रहे। बैंक राष्ट्रीयकरण कोई सरकारी दया नहीं, यह मजदूर वर्ग की जीत थी। इसे बचाना आज की पीढ़ी की जिम्मेदारी है। वामपंथी और श्रमिक आंदोलन इस मोर्चे पर फिर से डटे हैं।
