इलाहाबाद हाईकोर्ट के अधिवक्ता डॉ. गजेन्द्र सिंह यादव ने यूपी मानवाधिकार आयोग में भेजा प्रार्थना-पत्र, कहा- ध्वस्तीकरण से हजारों छात्रों की शिक्षा और सार्वजनिक धन दोनों पर पड़ेगा असर
प्रयागराज/लखनऊ : मौलाना मोहम्मद अली जौहर विश्वविद्यालय की इमारतों के प्रस्तावित ध्वस्तीकरण का मामला अब उत्तर प्रदेश राज्य मानवाधिकार आयोग, लखनऊ पहुंच गया है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के अधिवक्ता डॉ. गजेन्द्र सिंह यादव ने सोमवार को आयोग को विस्तृत प्रार्थना-पत्र भेजकर इस मामले में तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। आयोग ने शिकायत प्राप्त होने की पुष्टि करते हुए इसे डायरी संख्या 5718/IN/2026 के तहत दर्ज कर लिया है। प्रार्थना-पत्र में कहा गया है कि यदि विश्वविद्यालय की इमारतों का ध्वस्तीकरण किया जाता है तो इसका सीधा असर हजारों छात्रों की शिक्षा, परीक्षाओं, छात्रावास व्यवस्था और अन्य शैक्षणिक गतिविधियों पर पड़ेगा। भवन निर्माण संबंधी किसी भी विवाद का समाधान विधि द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के तहत किया जाना चाहिए, लेकिन ऐसी कार्रवाई से छात्रों के शिक्षा के अधिकार और भविष्य को नुकसान नहीं पहुंचना चाहिए। डॉ. गजेन्द्र सिंह यादव ने अपने आवेदन में यह भी कहा है कि विश्वविद्यालय की इमारतों के निर्माण पर पहले ही भारी सार्वजनिक एवं निजी धनराशि खर्च हो चुकी है।
ध्वस्तीकरण से निर्माण में लगी पूंजी होगी नष्ट

ऐसे में ध्वस्तीकरण से एक ओर निर्माण में लगी पूंजी नष्ट होगी, वहीं दूसरी ओर भवन गिराने की प्रक्रिया पर भी सरकारी धन खर्च होगा। इससे राजकोष पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ेगा।उन्होंने सुझाव दिया कि यदि भवनों का नियमितीकरण या कोई अन्य वैधानिक समाधान संभव है तो ध्वस्तीकरण के बजाय उसी विकल्प पर विचार किया जाना चाहिए। प्रार्थना-पत्र में मानवाधिकार आयोग से अनुरोध किया गया है कि वह इस पूरे मामले का स्वतः संज्ञान लेकर जांच कराए, जिला प्रशासन और रामपुर विकास प्राधिकरण से विस्तृत रिपोर्ट तलब करे तथा यह सुनिश्चित करे कि किसी भी प्रशासनिक कार्रवाई से छात्रों के मानवाधिकार, शिक्षा का अधिकार और उनके भविष्य पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े।
कानून का पालन आवश्यक
अधिवक्ता गजेंद्र सिंह यादव ने कहा कि कानून का पालन आवश्यक है, लेकिन उसके साथ छात्रों के हितों, मानवाधिकारों और सार्वजनिक संसाधनों के संरक्षण के बीच संतुलन बनाए रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। उन्होंने राज्य सरकार से ध्वस्तीकरण के बजाय नियमितीकरण अथवा अन्य जनहितकारी एवं वैधानिक विकल्पों पर गंभीरता से विचार करने की अपील की है।
