‘मम्मी-पापा की लड़ाई में बच्चों को मोहरा नहीं बना सकते’, इलाहाबाद हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी
पांच साल की बच्ची के बयान पर अदालत ने जताई चिंता, कहा- इतनी छोटी उम्र में ऐसी बातें सिखाना मानसिक विकास के लिए खतरनाक; कस्टडी पिता को सौंपी
प्रयागराज : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बच्चों की अभिरक्षा से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में कहा है कि माता-पिता के आपसी विवाद में बच्चों को मोहरा नहीं बनाया जा सकता। अदालत ने इसे बच्चे के बचपन और मानसिक विकास के साथ क्रूर खिलवाड़ करार दिया। न्यायमूर्ति संदीप जैन की अदालत ने डॉक्टर पिता की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई करते हुए पांच वर्षीय बच्ची की कस्टडी फिलहाल पिता को सौंपने का आदेश दिया।
अदालत में बच्ची ने लगाए पिता पर आरोप
सुनवाई के दौरान मां के साथ रह रही पांच वर्षीय बच्ची को अदालत में पेश किया गया। बातचीत के दौरान बच्ची ने कहा कि वह अपने पिता के साथ नहीं रहना चाहती और उन पर गंभीर आरोप लगाए। बच्ची के बयान को सुनने के बाद अदालत ने कहा कि उसकी उम्र और समझ को देखते हुए ऐसे शब्द और आरोप स्वाभाविक नहीं लगते।
अदालत बोली- बच्ची को सिखाई गई हैं बातें
हाईकोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि बच्ची को इस प्रकार की बातें सिखाई गई प्रतीत होती हैं। अदालत ने माना कि मां ने बच्ची को आपसी विवाद में मोहरे की तरह इस्तेमाल किया है। कोर्ट ने कहा कि इतनी कम उम्र में इस तरह की बातें बच्चे के मानसिक और भावनात्मक विकास पर गंभीर प्रभाव डाल सकती हैं।
पिता को मिली कस्टडी, मां को मुलाकात की अनुमति
अदालत ने आदेश दिया कि बच्ची फिलहाल पिता के साथ रहेगी। साथ ही मां को पिता के घर जाकर बच्ची से मिलने और वीडियो कॉल के माध्यम से बातचीत करने की अनुमति दी गई है। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि आगामी 17 अगस्त को होने वाली सुनवाई में पिता बच्ची को लेकर अदालत में उपस्थित हों।
दोनों पक्षों ने रखीं अपनी दलीलें
पिता की ओर से अदालत को बताया गया कि पहले कोर्ट ने वीडियो कॉल पर बातचीत की अनुमति दी थी, लेकिन मां बच्ची को पिता से बात नहीं करने देती और उनके खिलाफ भड़काती है। वहीं, मां की ओर से कहा गया कि पति-पत्नी के बीच गंभीर वैवाहिक विवाद हैं और बच्ची की कम उम्र को देखते हुए उसका मां के साथ रहना ही उचित होगा।
बच्चे का हित सर्वोपरि: हाईकोर्ट
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में सबसे महत्वपूर्ण पहलू बच्चे का कल्याण और उसका मानसिक विकास है। अदालत ने कहा कि किसी भी माता-पिता को अपने निजी विवाद में बच्चे का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए, क्योंकि इसका असर उसके पूरे भविष्य पर पड़ सकता है।
