नई दिल्ली : भारत में 1 अप्रैल 2026 से एक नए वित्तीय वर्ष की शुरुआत के साथ आर्थिक मोर्चे पर कई बड़े बदलाव लागू हो रहे हैं, जिनका असर सीधे आम आदमी की जेब, बचत और रोजमर्रा के खर्चों पर पड़ने वाला है। यह बदलाव सिर्फ कागजी नहीं हैं, बल्कि देश के वित्तीय ढांचे को एक नई दिशा देने वाले हैं। सबसे बड़ा बदलाव छह दशक पुराने आयकर कानून की विदाई और उसकी जगह ‘आयकर अधिनियम, 2025’ के लागू होने के रूप में सामने आया है। इसके साथ ही ‘जीएसटी 2.0’ के तहत टैक्स व्यवस्था में भी कई अहम परिवर्तन किए गए हैं, जिससे यह समझना जरूरी हो जाता है कि आम नागरिक के लिए क्या सस्ता होगा और क्या महंगा।
नए नियमों के लागू होने से पहले 31 मार्च 2026 की डेडलाइन बेहद अहम थी। वित्तीय वर्ष 2025-26 के खत्म होने से पहले कई जरूरी काम पूरे करना आवश्यक था, ताकि पेनल्टी और नुकसान से बचा जा सके। सबसे पहले टैक्स सेविंग निवेश की बात करें तो धारा 80C और 80D के तहत छूट पाने के लिए पीपीएफ, ईएलएसएस और जीवन बीमा जैसी योजनाओं में निवेश 31 मार्च तक करना जरूरी था। जो लोग यह समयसीमा चूक गए, उन्हें इस वित्तीय वर्ष में टैक्स छूट का लाभ नहीं मिलेगा।
इसी तरह पीपीएफ, एनपीएस और सुकन्या समृद्धि योजना जैसे खातों को सक्रिय बनाए रखने के लिए न्यूनतम राशि जमा करना भी जरूरी था। ऐसा न करने पर ये खाते निष्क्रिय हो सकते हैं और जुर्माना भी लग सकता है। इसके अलावा वित्तीय वर्ष 2020-21 के लिए अपडेटेड रिटर्न दाखिल करने की आखिरी तारीख भी 31 मार्च थी। वहीं, एनआरआई के लिए ‘फॉर्म 67’ जमा करना जरूरी था, ताकि वे विदेशी कर क्रेडिट का लाभ ले सकें और दोहरे कराधान से बच सकें।
अब बात करें 1 अप्रैल से लागू होने वाले ‘आयकर अधिनियम, 2025’ की, तो इसमें कई बड़े बदलाव किए गए हैं। सबसे महत्वपूर्ण बदलाव यह है कि अब ‘असेसमेंट ईयर’ और ‘प्रीवियस ईयर’ जैसी जटिल शब्दावली खत्म कर दी गई है और इसे सीधे ‘टैक्स ईयर’ कहा जाएगा। इससे आम करदाताओं के लिए टैक्स प्रणाली को समझना आसान होगा।
नई टैक्स व्यवस्था के तहत 12 लाख रुपये तक की वार्षिक आय को करमुक्त कर दिया गया है, जो मध्यम वर्ग के लिए बड़ी राहत है। इसके अलावा वेतनभोगियों को 75,000 रुपये का स्टैंडर्ड डिडक्शन भी मिलता रहेगा। वहीं पुरानी टैक्स व्यवस्था में भी कुछ बदलाव किए गए हैं, जैसे बच्चों के शिक्षा भत्ते को 100 रुपये से बढ़ाकर 3,000 रुपये प्रति माह कर दिया गया है और हॉस्टल भत्ता 300 रुपये से बढ़ाकर 9,000 रुपये कर दिया गया है। इसके साथ ही पुणे, बेंगलुरु, हैदराबाद और अहमदाबाद को एचआरए के लिए टियर-1 शहरों में शामिल किया गया है, जिससे वहां रहने वाले कर्मचारियों को अधिक टैक्स छूट मिलेगी।
निवेश से जुड़े नियमों में भी बदलाव हुआ है। अब सेकेंडरी मार्केट से खरीदे गए सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड पर मैच्योरिटी के समय कैपिटल गेन टैक्स देना होगा। फ्यूचर्स और ऑप्शंस ट्रेडिंग पर सिक्योरिटीज ट्रांजेक्शन टैक्स बढ़ा दिया गया है, जिससे ट्रेडिंग महंगी हो जाएगी। वहीं कंपनियों के शेयर बायबैक पर अब शेयरधारकों को टैक्स देना होगा।
विदेश यात्रा करने वालों के लिए राहत की खबर है। ओवरसीज टूर पैकेज पर टीसीएस दर को घटाकर 2% कर दिया गया है, जिससे विदेश घूमना पहले की तुलना में सस्ता हो जाएगा।
‘जीएसटी 2.0’ के तहत टैक्स स्लैब को सरल बनाते हुए 5%, 18% और 40% तक सीमित कर दिया गया है। इसके तहत स्वास्थ्य और जीवन बीमा, 33 जीवन रक्षक दवाएं और अनपैक्ड डेयरी उत्पादों को टैक्स-फ्री कर दिया गया है। वहीं छोटे कार, एसी और टीवी पर टैक्स घटाकर 18% कर दिया गया है, जिससे ये चीजें सस्ती हो सकती हैं। हालांकि तंबाकू, लग्जरी गाड़ियां, बड़ी एसयूवी और ऑनलाइन गेमिंग पर 40% जीएसटी लगाया गया है, जिससे ये महंगे हो जाएंगे।
महंगाई के मोर्चे पर भी आम आदमी को झटका लग सकता है। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, खासकर ईरान और इजराइल के बीच हालात, का असर एलपीजी सिलेंडर की कीमतों पर पड़ा है। घरेलू गैस सिलेंडर की कीमत में बढ़ोतरी हो चुकी है और कमर्शियल सिलेंडर भी महंगा हो गया है, जिससे बाहर खाना-पीना महंगा होगा। दवाओं की कीमतों में भी वृद्धि देखने को मिल रही है। एनपीपीए ने 900 से अधिक आवश्यक दवाओं की कीमतों में करीब 1.74% तक बढ़ोतरी को मंजूरी दी है, जिसमें पैरासिटामोल और एंटीबायोटिक्स शामिल हैं।
ऑटो सेक्टर में भी कीमतों में इजाफा हुआ है। आगामी बीएस-7 उत्सर्जन मानकों और बढ़ती लागत के कारण कई कंपनियों ने गाड़ियों की कीमतें बढ़ा दी हैं। इससे नई कार खरीदना महंगा हो सकता है। बैंकिंग और डिजिटल लेनदेन के नियमों में भी बदलाव किए गए हैं। एचडीएफसी बैंक अब यूपीआई आधारित कार्डलेस एटीएम निकासी को भी फ्री ट्रांजेक्शन की सीमा में गिनेगा। इसके बाद अतिरिक्त निकासी पर शुल्क देना होगा। न्यूनतम बैलेंस न रखने पर अब जुर्माना शॉर्टफॉल के आधार पर लगेगा, जिससे ग्राहकों को कुछ राहत मिलेगी।
नए पैन कार्ड के लिए अब सिर्फ आधार कार्ड पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि जन्म प्रमाण पत्र या 10वीं का सर्टिफिकेट भी देना होगा। इसके अलावा डिजिटल पेमेंट के लिए सुरक्षा बढ़ाते हुए 2-फैक्टर ऑथेंटिकेशन अनिवार्य कर दिया गया है। पेंशन और बीमा से जुड़े नियमों में भी सुधार किया गया है। एनपीएस में अब रिटायरमेंट के समय 80% तक राशि एकमुश्त निकाली जा सकती है, जो पहले 60% थी। यदि कुल कॉर्पस 8 लाख रुपये या उससे कम है, तो पूरी राशि एक साथ निकाली जा सकती है। हेल्थ इंश्योरेंस में मोरेटोरियम अवधि को घटाकर 5 साल कर दिया गया है, जिससे पांच साल तक लगातार प्रीमियम भरने के बाद बीमा कंपनी किसी पुरानी बीमारी के आधार पर क्लेम खारिज नहीं कर सकेगी।
यात्रा से जुड़े नियमों में भी बदलाव हुआ है। फास्टैग का वार्षिक पास थोड़ा महंगा हो गया है। वहीं भारतीय रेलवे ने टिकट कैंसिलेशन नियमों में बदलाव करते हुए कन्फर्म टिकट को ट्रेन के प्रस्थान से 8 घंटे पहले तक ही रिफंड योग्य रखा है। इसके बाद कैंसिल करने पर कोई रिफंड नहीं मिलेगा। कुल मिलाकर, 1 अप्रैल 2026 से लागू हो रहे ये सभी बदलाव इस ओर इशारा करते हैं कि सरकार देश की अर्थव्यवस्था को अधिक पारदर्शी, डिजिटल और संगठित बनाने की दिशा में आगे बढ़ रही है। जहां एक ओर मध्यम वर्ग को टैक्स में राहत और स्वास्थ्य सेवाओं में सस्ता विकल्प मिला है, वहीं दूसरी ओर महंगाई का दबाव भी बढ़ सकता है। ऐसे में हर व्यक्ति के लिए जरूरी है कि वह अपनी वित्तीय योजना को समझदारी और अनुशासन के साथ बनाए, ताकि इन बदलावों के बीच भी आर्थिक संतुलन बनाए रखा जा सके।
