आरोपी सास ससुर दोषमुक्त, 35 हजार का अर्थदंड
बरेली : शहर के सुभाषनगर थाना क्षेत्र में दहेज हत्या के एक मामले में अदालत ने अहम फैसला सुनाया है।डीजीसी क्रिमिनल (शासकीय अधिवक्ता अपराध) रीतराम राजपूत की मजबूत पैरवी के बाद अदालत ने आरोप पति गोविन्द सिंह को दोषी ठहराते हुए उम्रकैद (आजीवन कारावास) की सजा सुनाई है। इसके साथ ही अलग-अलग धाराओं में कुल 35 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया है। इस केस में सास द्रोपदी देवी और ससुर जसवीर सिंह को सबूतों के अभाव में संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया गया। इस केस में एडीजीसी सुनील कुमार पांडे ने भी मजबूत साक्ष्य पेश किए थे।
15 महीने पहले हुई थी शादी
मामले के अनुसार, वीरपाल सिंह यादव ने 14 अगस्त 2020 को थाना सुभाषनगर में रिपोर्ट दर्ज कराई थी।उन्होंने बताया कि उनकी बेटी पूनम यादव की शादी करीब 15 महीने पहले गोविन्द सिंह से हुई थी। आरोप है कि शादी के बाद से ही ससुराल वाले दहेज को लेकर नवविवाहिता को परेशान करते थे। 14 अगस्त 2020 को दोपहर करीब 12:40 बजे फोन पर सूचना मिली कि उनकी बेटी ने फांसी लगा ली है। जब परिवार के लोग वहां पहुंचे तो उन्होंने देखा कि पूनम यादव साड़ी के सहारे पंखे से लटकी हुई थी और उसके पैर जमीन को छू रहे थे। परिजनों ने आरोप लगाया कि उसे मारकर फांसी पर लटकाया गया है। उस समय वह नौ महीने की गर्भवती भी थी।
पुलिस ने दर्ज किया था मुकदमा
परिजनों की तहरीर के आधार पर थाना सुभाषनगर में मुकदमा दर्ज किया गया। पुलिस ने पति गोविन्द सिंह, ससुर जसवीर सिंह और सास द्रोपदी देवी के खिलाफ धारा 498ए, 304बी आईपीसी और दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धारा 3/4 के तहत केस दर्ज किया। जांच के दौरान पुलिस ने घटनास्थल का निरीक्षण किया, पंचनामा तैयार किया और शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजा।
अदालत ने अहम फैसला
अदालत ने सबूतों और गवाहों के आधार पर दहेज हत्या के आरोपी पति गोविन्द सिंह को दोषी मानते हुए धारा 304बी (दहेज मृत्यु) के तहत आजीवन कारावास की सजा सुनाई। इसके अलावा धारा 498ए आईपीसी के तहत 3 साल की जेल और 25 हजार रुपये का जुर्माना तथा धारा 4 दहेज प्रतिषेध अधिनियम के तहत 2 साल की जेल और 10 हजार रुपये का जुर्माना लगाया। अदालत ने यह भी कहा कि अगर जुर्माना नहीं भरा गया तो अतिरिक्त जेल की सजा भी भुगतनी होगी।
सास-ससुर को मिला संदेह का लाभ
इस मामले में सहआरोपी ससुर जसवीर सिंह और सास द्रोपदी देवी के खिलाफ पुख्ता सबूत नहीं मिलने पर अदालत ने उन्हें संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया। इस मामले में अभियोजन की ओर से डीजीसी रीत राम राजपूत ने बताया कि मजबूत साक्ष्यों को पेश किया गया था। इसके साथ ही कोर्ट में पैरवी की। जिसके चलते आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई है। इससे पहले भी डीजीसी क्रिमिनल रीतराम राजपूत ने कई मुकदमों में मजबूत पैरवी के चलते आरोपियों को आजीवन कारावास की सजा कराई है।
