लखनऊ : समाजवादी चिंतक एवं किसान संघर्ष समिति के संयोजक डॉ. सुनीलम ने खुशी जाहिर करते हुए कहा कि लंबे संघर्ष के बाद जातिगत जनगणना की घोषणा समाजवादी, लोकतांत्रिक और सामाजिक न्याय के तमाम संगठनों व नेताओं की अविरल मुहिम की जीत है। उन्होंने कहा कि छत्रपति शाहू से लेकर डॉ. भीमराव आंबेडकर, महात्मा ज्योतिबा फुले, पेरियार, डॉ. राममनोहर लोहिया और स्व. मुलायम सिंह यादव जैसे विचारकों ने यह संदेश दिया कि बिना सटीक आंकड़ों के वंचितों व पिछड़ों का अधिकार सुरक्षित नहीं हो सकता। इस संघर्ष को लंबे समय से समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव आगे बढ़ा रहे थे। इन्हीं कोशिशों के बाद यह ऐतिहासिक जीत मिली है।
संघर्ष की लंबी राह: अतीत से जुड़ी प्रेरणा
छत्रपति शाहू महाराज ने 19वीं सदी में ही अनुसूचित जातियों के अधिकारों की पैरवी कर आरक्षण की जड़ें जमा दीँ थीं।
महात्मा ज्योतिबा–सावित्रीबाई फुले ने पुणे व मुंबई में अछूतों व महिलाओं के लिए निशुल्क पाठशालाएँ शुरू कीं।
बाबा साहेब आंबेडकर ने संविधान में सामाजिक न्याय के मजबूत प्रावधान कराने तक का मार्ग प्रशस्त किया।
पेरियार ने दक्षिण भारत में जाति-विरोधी आंदोलन को धार दी और आरक्षण की नींव रखी।
डॉ. राममनोहर लोहिया ने “पिछड़ा पावे सौ में साठ” का सूत्र पेश कर सामाजिक असंतुलन को तोड़ने का विचार दिया।
फातिमा शेख ने मुस्लिम पिछड़ों की शिक्षा और उत्थान को अपनी प्राथमिकता बनाया।
वर्तमान युग के पूर्व प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह ने संसद में मंडल आयोग की सिफारिशों का प्रस्ताव रखा, जबकि कर्पूरी ठाकुर, मधु लिमये, सुरेंद्र मोहन, रवि राय, शरद यादव, लालू प्रसाद यादव,स्वर्गीय मुलायम सिंह यादव, रामविलास पासवान व काशीराम जैसे नेताओं ने आरक्षण का विस्तार सुनिश्चित किया।
“डॉ. सुनीलम ने बल दिया कि यह सभी नेता-विचारक इस वर्ष पहली बार संपन्न हुई जाति-आधारित जनगणना के आधार बने,”
मंडल आयोग की अधूरी सिफारिशें—अब असली लड़ाई
पूर्व विधायक डॉ. सुनीलम ने याद दिलाया कि मंडल आयोग (1980) ने पिछड़ों की जनसंख्या के अनुपात में 27 फीसद आरक्षण की सिफारिश की थी, किन्तु आज तक उसका पूर्ण क्रियान्वयन नहीं हो सका। अब जब जाति-जनगणना के आंकड़े उपलब्ध हैं, अगली चुनौतियाँ हैं:
प्रतिनिधित्व बढ़ाना
शिक्षा, सरकारी नौकरी व राजनीतिक संस्थानों में जनसंख्या के अनुपातानुसार आरक्षण का लागू होना। स्थानीय पंचायत, नगर निकाय व विधानसभा स्तर तक आरक्षण का विस्तार।
निजीकरण पर रोक
सार्वजनिक स्वास्थ्य, शिक्षा व बुनियादी सुविधाओं के पूर्ण निजीकरण को रोकना।, कॉरपोरेट गुटों पर पारदर्शिता एवं नियंत्रण सुनिश्चित करना।
श्रम सुधार
कार्यदिवस को 12 से घटाकर 8 घंटे सीमित करना। “क्लीनिक” श्रम-समझौते रद्द कर श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा और लाभ सुनिश्चित करना।
-“आवाज दो—हम एक हैं”
अपने आवाहन में डॉ. सुनीलम ने किसान संघर्ष समिति, समाजवादी आंदोलन, पीडीए (पिछड़ा–दलित–अल्पसंख्यक गठबंधन) और देश भर के सामाजिक व छात्र संगठनों से एकजुट होकर आगे बढ़ने का आह्वान किया। बोले, “जाति-आधारित गणना हमें न्याय के द्वार तक ले जाएगी। अब समान भागीदारी, पारदर्शिता और अधिकारों के लिए हर मोर्चे पर संघर्ष करना होगा।” उन्होंने किसान-संगठन के वरिष्ठ नेता मधु लिमए को जन्मदिन की बधाई देते हुए कहा कि उनके विचार किसानों और मज़दूरों के कल्याण की लड़ाई में प्रेरणा बने रहेंगे।
राजेंद्र सच्चर कमेटी की सिफारिशें
2005 में यूपीए सरकार द्वारा गठित राजेंद्र सच्चर कमेटी ने 2006 में अपनी रिपोर्ट सौंपी। इसमें मुस्लिम समुदाय की सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक स्थिति की बदहाली को उजागर किया गया। कमेटी ने मुस्लिम पिछड़े वर्गों को आरक्षण, विशेष योजनाओं और डेटा संग्रह की सिफारिश की। हालांकि, इन सिफारिशों को पूरी तरह लागू नहीं किया गया और इसे लेकर राजनीतिक विवाद भी हुआ।
सपा प्रमुख अखिलेश यादव और पीडीए का गठन
सामाजिक न्याय की इस लड़ाई को समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने नए सिरे से मजबूत किया। उन्होंने 2022 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) रणनीति की शुरुआत की। यह गठबंधन सामाजिक न्याय के मूल्यों को पुनर्स्थापित करने और समाज के वंचित वर्गों को एकजुट करने का प्रयास है। पीडीए ने समाजवादी पार्टी की राजनीतिक रणनीति को मजबूत किया और सामाजिक समावेश के लिए एक नया मंच प्रदान किया। अखिलेश यादव ने इस रणनीति के माध्यम से मुलायम सिंह यादव के सामाजिक न्याय के दृष्टिकोण को आधुनिक संदर्भ में और प्रभावी बनाया।
