नई दिल्ली : देश की अर्थव्यवस्था एक गंभीर मोड़ पर खड़ी है। जहां एक ओर आम जनता बेरोज़गारी, महंगाई और भुखमरी से जूझ रही है, वहीं दूसरी ओर सोने के दाम 1 लाख रुपये प्रति तोला को पार कर गए हैं। यह आंकड़ा न सिर्फ बाजार की स्थिति को दर्शाता है, बल्कि यह देश की आर्थिक असमानता की गहराई को भी उजागर करता है।
सोना महंगा क्यों हुआ?

आर्थिक जानकारों का कहना है कि जब बाजार में अनिश्चितता और निवेश के पारंपरिक साधनों (जैसे शेयर बाजार, जमीन या उद्योग) में जोखिम बढ़ता है, तब निवेशक सोने की ओर रुख करते हैं। सोने की मांग बढ़ने से दाम भी आसमान छूने लगते हैं। इस समय यही हो रहा है। “सोने की कीमतों में यह उछाल देश की अर्थव्यवस्था में लोगों के भरोसे की कमी को दर्शाता है।
अमीर और गरीब के बीच गहराता फासला

जब देश की बड़ी आबादी नौकरी और रोज़गार के लिए संघर्ष कर रही है, तब एक वर्ग ऐसा भी है जो बिना किसी आर्थिक असुरक्षा के सोने में निवेश कर रहा है। इसका मतलब साफ है।आम आदमी की खरीदने की क्षमता घट रही है लेकिन अमीरों के पास इतना अधिशेष पूंजी है कि वे उसे सोने में झोंक रहे हैं यह आर्थिक असमानता आने वाले समय में सामाजिक असंतुलन को और बढ़ा सकती है। रोज़गार का संकट और घटती आमदनी बाजार विश्लेषकों का मानना है कि जब काम-धंधे घटते हैं, तब रोज़गार के अवसर भी खत्म होने लगते हैं। नोटबंदी, जीएसटी जैसी नीतियों ने पहले ही छोटे व्यापारियों की कमर तोड़ दी थी अब मंदी और उच्च महंगाई दर ने रही-सही कसर पूरी कर दी है इसका सीधा असर बाजार की खपत और लोगों की आमदनी पर पड़ रहा है
भाजपा की नीतियों पर विपक्ष का हमला
विपक्षी दलों का कहना है कि भाजपा सरकार की गलत और भ्रष्ट नीतियां देश को इस आर्थिक संकट की ओर ले गई हैं। बेरोजगारी ऐतिहासिक स्तर पर है महंगाई बेलगाम हो चुकी है गरीब और मध्यम वर्ग की बचत खत्म हो रही
जनता का दर्द: “कमायें क्या, खाएं क्या?”
ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में रह रहे गरीब और वंचित तबके का सबसे बड़ा सवाल यही है।
“जब काम नहीं है, रोजगार नहीं है, तब रोटी कैसे आएगी?”
देश की नीतियाँ अगर सिर्फ अमीरों के लिए बनती रहीं, तो गरीब तबका हाशिये पर धकेला जाता रहेगा।
