पुण्यतिथि पर विशेष
“राजनीति सिर्फ कुर्सी तक नहीं, खेतों तक भी पहुंचनी चाहिए।”इस विचार को अपने जीवन का मंत्र बनाने वाले चौधरी चरण सिंह आज भी भारतीय लोकतंत्र में एक आदर्श के रूप में याद किए जाते हैं। 29 मई को जब देश उनका निर्वाण दिवस मनाता है, तो यह अवसर सिर्फ एक नेता को याद करने का नहीं, बल्कि किसान आधारित राजनीति की पुनः समीक्षा करने का है। यह किसान संघर्ष, स्वाभिमान और नेतृत्व के प्रतीक चौधरी चरण सिंह की स्मृति में नतमस्तक होने का दिन होता है। वर्ष 1902 में उत्तर प्रदेश के नूरपुर में जन्मे चरण सिंह न सिर्फ स्वतंत्रता सेनानी थे, बल्कि आज़ाद भारत में किसानों की आवाज़ को सत्ता के गलियारों तक पहुँचाने वाले सबसे प्रखर नेताओं में एक थे। वह उस पीढ़ी के नेता थे जिन्होंने खादी नहीं, खून-पसीना पहना था।
किसानों का असली मसीहा
चौधरी चरण सिंह का जीवन पूरी तरह किसानों के हक और सम्मान के लिए समर्पित रहा। उन्होंने ज़मींदारी उन्मूलन, जोत सीमा कानून,चकबंदी, कर्जमाफी, और एमएसपी जैसी योजनाओं की बुनियाद रखी, जो आज भी भारतीय कृषि नीति के स्तंभ माने जाते हैं। उनकी यह सोच महज़ कानूनों तक सीमित नहीं थी। उन्होंने किसानों के लिए किताबें लिखीं, नीतियाँ गढ़ीं और सत्ता में रहते हुए भी अपना ‘खेत’ नहीं छोड़ा। उन्हें ‘किसानों का गांधी’ कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।
राजनीति में सख्त लेकिन अकेले योद्धा
1937 से विधायक बने चरण सिंह ने उत्तर प्रदेश की पहली गैर-कांग्रेसी सरकार की अगुवाई की। उन्होंने नेहरू से वैचारिक असहमति, पटेल के प्रति निष्ठा, और इंदिरा गांधी के साथ राजनीतिक सौदेबाज़ी हर स्तर पर राजनीति के जटिल समीकरणों में हिस्सा लिया, लेकिन कभी अपनी ग्रामीण प्राथमिकताओं से समझौता नहीं किया। उनका प्रधानमंत्री बनना एक सपना था, जो उन्होंने 1979 में पूरा किया। मगर, विडंबना यह रही कि संसद में बहुमत साबित करने से पहले ही उनका समर्थन वापस ले लिया गया और उन्हें एक दिन भी संसद में प्रधानमंत्री के रूप में बोलने का मौका नहीं मिला। इससे बड़ा राजनीतिक विरोधाभास शायद ही किसी और नेता के जीवन में रहा हो।
नीति, नैतिकता और राजनीतिक ‘चालाकियों’ का द्वंद्व
चौधरी साहब का जीवन उन नेताओं के लिए आईना है जो नैतिकता और सत्ता के बीच सही संतुलन नहीं बना पाते। उन्हें ‘चेयर सिंह’ कहा गया, पर सच्चाई यह है कि वे उस कुर्सी को सिर्फ पाने के लिए नहीं, बल्कि किसानों की पीड़ा वहाँ तक पहुंचाने के लिए दौड़ रहे थे। उन्होंने राजनीति में जातिगत भेदभाव, सामाजिक अन्याय और सांस्कृतिक पिछड़ेपन के खिलाफ मोर्चा खोला। आरक्षण और कोटा को वे सामाजिक न्याय के औजार के रूप में देखते थे, और गांधी-लोहिया-आंबेडकर के विचारों के बीच एक प्राकृतिक सेतु बनने की कोशिश करते रहे।
विरासत और आज का दौर
आज जब भारत के किसान आंदोलन, MSP की गारंटी, भूमि अधिकार और सहकारी ढांचे की फिर से चर्चा हो रही है, तो चरण सिंह की सोच पहले से कहीं ज्यादा प्रासंगिक हो गई है। उनकी लिखी नीतियाँ और भाषण आज भी संसद के दस्तावेज़ों में नहीं, किसानों के दिलों में जीवित हैं। 2024 में जब भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित किया, तब यह न सिर्फ एक नेता को श्रद्धांजलि थी, बल्कि किसानों के संघर्ष को राष्ट्रीय स्वीकृति भी थी। एक ऐसा प्रधानमंत्री, जिसने संसद का सामना नहीं किया। एक ऐसा नेता, जिसने कुर्सी को नहीं, किसानों को सबसे बड़ा पद माना। चौधरी चरण सिंह हमारे लोकतंत्र के सबसे अनूठे अध्याय हैं। एक ऐसा अध्याय, जिसे अब सिर्फ पढ़ा नहीं, बल्कि नीतियों में जिया जाना चाहिए।
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