लेखक: डॉ. सुनीलम
राष्ट्रीय अध्यक्ष, किसान संघर्ष समिति
25 जून 1975 भारतीय लोकतंत्र का वह काला दिन, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अपने चुनाव को निरस्त करने वाले इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के बाद देश पर आपातकाल थोप दिया। विपक्ष के तमाम नेता जेल में बंद कर दिए गए, प्रेस की आज़ादी खत्म कर दी गई, और कार्यपालिका पूरी तरह पंगु हो गई। यह भारतीय लोकतंत्र के चारों स्तंभों विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और प्रेस पर एक साथ हमला था। आज, आपातकाल की 50वीं वर्षगांठ पर भाजपा ने “काला दिवस” मनाया है। लेकिन यह अवसर सिर्फ अतीत को याद करने का नहीं, बल्कि यह परखने का है कि क्या देश वाकई आपातकाल से मुक्त हो चुका है, या वह एक और अधिक खतरनाक और अदृश्य आपातकाल की गिरफ्त में है?
आपातकाल: 1975 बनाम 2025
1975 में आपातकाल की घोषणा लिखित तौर पर हुई थी। मौलिक अधिकारों को खत्म कर दिया गया था। मीडिया सेंसरशिप लागू थी। राजनीतिक विरोध को जेलों में ठूंस दिया गया था।
2025 में अब कोई आधिकारिक आपातकाल नहीं है, लेकिन विपक्षी सरकारें गिराई जा रही हैं। राष्ट्रपति और राज्यपाल निष्पक्षता खो चुके हैं। मीडिया का बड़ा हिस्सा “गोदी मीडिया” में तब्दील हो गया है। आलोचना करने वालों पर UAPA, राजद्रोह जैसे कड़े कानून लगाए जा रहे हैं।
आज की सत्ता: निर्वाचित सरकार या नियंत्रित व्यवस्था ?
2014 के बाद से केंद्र में सत्ता में आई मोदी-शाह की जोड़ी ने देश की संवैधानिक संस्थाओं को नकेल में ले लिया है। नोटबंदी, लॉकडाउन, धारा 370 हटाना, इन सभी बड़े फैसलों में राष्ट्रपति ने कोई सवाल नहीं उठाया। राज्यपालों का उपयोग विपक्षी सरकारों को अस्थिर करने में किया गया। सवाल उठता है, क्या यह लोकतंत्र की हत्या नहीं है, लेकिन बिना घोषणा वाला आपातकाल नहीं है?
सामाजिक संगठन या समानांतर सरकार?
इंदिरा गांधी के दौर में जहां संजय गांधी और उनका गिरोह सत्ता के केंद्र में था, वहीं आज संघ परिवार, बजरंग दल, और विश्व हिंदू परिषद जैसी संस्थाएं सत्ता के समानांतर काम कर रही हैं। गौ रक्षा के नाम पर लिंचिंग लव जिहाद और धर्मांतरण के नाम पर हिंसा, मणिपुर में जातीय टकराव का भयावह रूप। यह सब इस बात का संकेत है कि असंवैधानिक शक्तियां लोकतंत्र के ऊपर हावी हो चुकी हैं।
मानवाधिकारों की स्थिति: कश्मीर से बस्तर तक
जम्मू-कश्मीर को जेल में तब्दील कर दिया गया है। इंटरनेट बंदी, नजरबंद मुख्यमंत्री, युवाओं पर फर्जी मुकदमे। बस्तर में 500 से अधिक आदिवासियों की माओवादी कहकर हत्याएं। भीमा कोरेगांव से लेकर दिल्ली दंगों तक, सैकड़ों सामाजिक कार्यकर्ता जेल में हैं।
लोकतंत्र की वापसी की उम्मीद
इंदिरा गांधी के खिलाफ 1977 में जनता पार्टी की जीत ने लोकतंत्र को नया जीवन दिया था। आज, भाजपा 303 से घटकर 240 पर आ गई है। समाजवादी ताकतें, जो कभी 5 सीटों पर थीं, आज संसद में 37 सांसदों के साथ मौजूद हैं। संयुक्त किसान मोर्चा, केंद्रीय श्रमिक संगठन और नागरिक समाज मिलकर आज लोकतंत्र की नई लड़ाई का नेतृत्व कर रहे हैं। INDIA गठबंधन की 26 पार्टियां, 234 सांसद और हज़ारों विधायक इस संघर्ष में साथ हैं।
